मोदी जी, ऐसा ही हाल रहा तो “आयुष्मान भारत” जैसी योजनाएं भी होंगी विफल

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नई दिल्ली। बीते दिनों पीएम नरेंद्र मोदी ने 11 करोड़ गरीब परिवारों के लिए हर साल 5 लाख रुपए की स्वास्थ्य बीमा योजना “आयुष्मान भारत” लॉन्च की थी। योजना शुरु हुए दो दिन ही बीते थे कि लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में एक शख्स को इस योजना के तहत स्वास्थ्य सेवा देने से इनकार कर दिया गया। दरअसल, योजना चाहे कितनी भी अच्छी हो, लेकिन सरकारी और अर्धसरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा इसमें पलीता लगाने का काम करती है। वजह ये है कि पूरा तंत्र चरमराया हुआ है।

भारत ने अन्य 196 देशों के साथ कजाकिस्तान के अस्ताना में एक समझौते पर 40 साल पहले 1978 में दस्तखत किए थे। उस समझौते में सबको बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के लिए चार बिंदुओं पर काम करने पर भारत ने भी हामी भरी थी, लेकिन 40 साल बाद भी अपनी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को सुधारने में देश की कोई सरकार आगे आती नहीं दिख रही है।

हालत ये है कि भारत में दुनिया की कुल प्रसवकालीन मौतों में से 17 फीसदी होती हैं। सबसे ज्यादा टीबी के मामले यहां पाए जाते हैं और इस बीमारी से दुनियाभर में सबसे ज्यादा मौतें भी भारत में हो रही हैं। इसके अलावा आंकड़े बताते हैं कि साल 2011-2012 में 5.5 करोड़ भारतीय इतने गरीब हो गए कि वे स्वास्थ्य सेवा का लाभ तक हासिल नहीं कर सके।

40 साल पहले अस्ताना में हुए समझौते के तहत निम्नलिखित 4 बिंदुओं पर काम करने के लिए भारत राजी हुआ था।
1-सभी को बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने के लिए उचित राजनीतिक कदम उठाना।
2-प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को ठीक करना।
3-लोगों और समुदायों को इसके लिए ताकतवर बनाना।
4-राष्ट्रीय नीतियों, रणनीति और योजना में जरूरी लोगों का साथ लेना।

इन चारों जरूरी कदमों में से एक पर भी भारत की किसी सरकार ने काम नहीं किया। उदाहरण के तौर पर 2018-19 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का 55 फीसदी बजट राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए रखा गया। जिसमें से 74 फीसदी को मातृत्व और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए तय किया गया। इसमें ध्यान ये नहीं रखा गया कि तनाव, कैंसर और डायबिटीज से 2016 में ही 61 फीसदी बीमारों की मौत हो गई थी।

भारत में स्वास्थ्य सेवा सभी को नहीं मिलती। हालत ये है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उचित देखभाल न होने की वजह से साल 2016 में 16 लाख लोगों ने जान गंवाई। जबकि, स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच न होने की वजह से 8 लाख 38 हजार लोगों की जान गई थी। महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की रिपोर्ट कहती है कि 24 राज्यों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में जरूरी दवाइयां नहीं थीं। जबकि, 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से 24 से 38 फीसदी में डॉक्टर नहीं थे। इसका मतलब साफ है कि ग्रामीण इलाकों में 58 फीसदी और शहरी इलाकों में 68 फीसदी को निजी अस्पतालों का ही सहारा था।

आम लोगों के स्वास्थ्य को लेकर सरकारें कितनी सजग हैं, ये इसी से पता चलता है कि हर व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए हर साल औसतन 1 हजार 112 रुपए का खर्च ही सरकार मानकर चलती है। 2017 में बनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में कहा गया है कि साल 2025 तक सबको स्वास्थ्य सेवा देने के लिए जीडीपी का 2.5 फीसदी खर्च करना होगा, लेकिन 2010 में तय किए गए 2 फीसदी के टारगेट को केंद्र की सरकारों 2018 में भी हासिल नहीं किया है।

तो मोदी जी, आपने भले ही आयुष्मान भारत योजना लॉन्च कर 11 करोड़ गरीबों को स्वास्थ्य सेवा देने का कदम उठाया हो, लेकिन लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में हुई घटना बताती है कि आपकी ये अभिनव योजना का नतीजा उस वक्त तक नहीं निकल सकता, जब तक आपकी सरकार सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी लिए ध्यान नहीं देती।

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