अगर रेस्त्रां में ज्‍यादा खाया खाना, तो प्रीमियम बढ़ा सकती हैं हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां !

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नई दिल्ली। अपने मनपसंद रेस्‍त्रां से ज्‍यादातर फास्‍ट फूड या जंक फूड ऑर्डर करने वाले लोगों को अब सावधान हो जाना चाहिए, क्‍योंकि इसका असर अब उनकी हेल्‍थ इंश्‍योरेंस पॉलिसी के प्रीमियम पर भी पड़ सकता है। जी हां, यह सच है। इसका कारण है फिटनेस बैंड और ऑनलाइन एप्‍स से निकला आपका वह डेटा, जो बताएगा कि भविष्य में आपकी सेहत कैसी रहेगी ?

इंश्‍योरेंस कंपनियां कर रहीं तैयारी

बता दें कि अभी तक हेल्‍थ इंश्‍योरेंस कंपनियां सिर्फ आपके मौजूदा स्वास्थ्य के आधार पर पॉलिसी जारी करती हैं। फिलहाल ज्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के पास अपने ग्राहकों के हेल्थ रिकॉर्ड का कोई डेटा नहीं है, लेकिन अब ऑनलाइन एप्‍स से हेल्थ डेटा मिलने के बाद कंपनियों को जिन लोगों की सेहत में ज्यादा जोखिम नजर आएगा, वहां प्रीमियम की दर बढ़ाकर कंपनियां अपना जोखिम कम कर सकती हैं। फिटनेस बैंड से भी इस तरह का डाटा जुटाया जा सकता है। कहा जा रहा है कि कई कंपनियों ने तो अपने डेटाबेस बनाने शुरू भी कर दिए हैं।

हेल्थ डेटा इकट्ठा करेंगी कंपनियां  

बता दें कि महंगे इलाज, बढ़ती इनकम और जागरूकता की वजह से हेल्थ इंश्योरेंस सेक्टर में सालाना 26 फीसदी की दर से बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में इस सेक्टर की कई बड़ी कंपनियां अब हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स, डायग्नोस्टिक लैब, फिटनेस गैजेट और वियरेबल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के अलावा ऑनलाइन हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म से भी डेटा शेयरिंग पर अपना ध्‍यान केंद्रित कर रही हैं। भविष्‍य में ये कंपनियां फूड डिलिवरी एप्स से भी डेटा ले सकती हैं। इनसे उन्हें आपकी कम्प्लीट हेल्थ प्रोफाइल बनाने में मदद मिलेगी।

लग जाएगा सेहत का अनुमान

रिपोर्ट के अनुसार, बजाज आलियांज हेल्थ इंश्योरेंस के प्रेसिडेंट साई श्रीनिवास का कहना है कि हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी लेने के लिए अभी जो जांचें होती हैं, उनसे सिर्फ यही पता चलता है कि कोई व्यक्ति पॉलिसी लेते वक्त स्वस्थ्य है या नहीं। इसी के आधार पर प्रीमियम और कवर तय होता है। कंपनियों को यह नहीं पता होता कि पहले उपभोक्‍ता का स्वास्थ्य कैसा था या फिर भविष्‍य में उसका स्वास्थ्य कैसा होगा ? श्रीनिवास कहते हैं कि अब टेक्नोलॉजी खासतौर पर फिटनेस बैंड जैसे प्रोडक्ट की मदद से हम भविष्य में सेहत कैसी रहेगी, इसका अंदाजा लगा सकते हैं। इससे हमें सही पॉलिसी डिजाइन और सही प्रीमियम तय करने में भी मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए यदि किसी उपभोक्‍ता के फिटनेस बैंड का डेटा बताता है कि उसकी सेहत में सुधार हो रहा है और उसका लाइफ स्टाइल हेल्दी है तो रिन्युअल के वक्त उसे कम प्रीमियम देना होगा। अगर किसी की सेहत में गिरावट आ रही है तो उसका प्रीमियम बढ़ जाएगा।

रोजाना 5 लाख फूड ऑर्डर

एक आंकड़े के अनुसार, मौजूदा समय में देश की 24 फीसदी आबादी के पास स्‍मार्टफोन हैं यानी करीब 30 करोड़ लोग स्‍मार्टफोन का इस्‍तेमाल करते हैं। वहीं करीब 27 लाख लोग फिटनेस बैंड या स्‍मार्टवाच का इस्‍तेमाल करते हैं। आंकड़े बताते हैं रोजाना करीब 5 लाख खाने के ऑर्डर विभिन्‍न कंपनियों के पास डिलीवरी के लिए आते हैं। इनके उपभोक्‍ताओं की उम्र 25 से 45 साल के बीच है। ये कंपनियां खाने पर अच्‍छा-खासा डिस्‍काउंट (50 फीसदी तक) भी देती हैं, जिसके कारण इनकी डिमांड दिन पर दिन बढ़ रही है।

कई सवाल भी

इंडस लॉ फर्म में पार्टनर नमिता विश्वनाथ कहती हैं कि देश के मौजूदा कानूनी ढांचे में हेल्थ स्कोरिंग के लिए यूजर डेटा के इस्तेमाल को लेकर फिलहाल कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। हेल्थ इंश्योरेंस के लिए अगर यूजर डेटा के आधार पर कैटेगरी बनाई जाती हैं तो इसके लिए काफी गंभीरता से काम करना होगा। अगर पॉलिसी के तहत सुविधाएं या लाभ न देने का मजबूत आधार नहीं है तो फिर यह उपभोक्‍ताओं के साथ भेदभाव कहा जाएगा, जो न तो उपभोक्‍ता के लिए अच्छा कहा जाएगा और न ही इंश्‍योरेंस कंपनी के लिए।

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