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बच्चों को डांटिए और पीटिए मत, डॉक्टरों ने गंभीर खतरे की ओर किया इशारा

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वॉशिंगटन। बच्चों की बीमारियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों ने पैरेंट्स को आगाह किया है कि वे बच्चों को पीटना और डांटना छोड़ दें। डॉक्टरों का कहना है कि पीटने और डांटने से बच्चों में इसका गंभीर असर किशोरावस्था में दिख सकता है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पिडियाट्रिक्स ने बीते सोमवार को नई नीति जारी की है। इसमें कहा गया है कि बच्चों को पीटने और बुरी तरह डांटने से उनके दिमाग पर असर पड़ता है। ऐसा व्यवहार लगातार किया जाए, तो इससे वे बात न सुनने वाले और पलटकर जवाब देने वाले बन सकते हैं। साथ ही किशोरावस्था में उनके भीतर आत्महत्या की प्रवृत्ति भी घर कर सकती है।

डॉक्टरों ने कहा है कि बच्चों को डांटना, चांटा मारना, धमकी देना, उन्हें अपमानित करना वगैरह को भले ही पैरेंट्स सुधारने का कदम बताएं, लेकिन लंबी अवधि तक ऐसा अगर बच्चों के साथ किया जाता है, तो उनमें मानसिक विकृति आ जाती है। उनके मुताबिक हालांकि, अब माता-पिता बच्चों को उतना नहीं पीटते, लेकिन गंभीर गलतियों पर अब भी बच्चों से मार-पीट घरों में आम बात है।

डॉक्टरों ने कहा है कि छोटी-मोटी गलतियों पर बच्चों को समझाकर ही सुधारा जा सकता है। अगर वे बड़ी गलती करें, तो उनके चहेते खिलौनों को हटा देना या टीवी और मोबाइल न देखने देने की सजा ज्यादा असरदार हो सकती है। डॉक्टरों ने पाया कि जिन बच्चों को पैरेंट्स पीटते हैं, उनमें माता-पिता की बात फिर न मानने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है। बच्चे सोचते हैं कि पीटा ही तो जाएगा।

इन डॉक्टरों का ये भी कहना है कि बच्चों को लगातार पीटने या उन्हें अपमानित करने से दिमाग में भी परिवर्तन होते हैं। उनका दिमाग सिकुड़ने लगता है और तनाव बढ़ाने वाले हॉर्मोन भी शरीर में ज्यादा हो जाते हैं। इससे उनके भीतर आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है। वे गालियां देने लगते हैं और बात-बात पर काफी नाराज होने के साथ पढ़ाई से भी दूर भागने लगते हैं। बच्चों से गाली-गलौज करने से वे डिप्रेशन में आ जाते हैं और किशोरावस्था आने तक वे भी दूसरों से खराब व्यवहार करने लगते हैं। ऐसे में उन्हें उस उम्र में सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

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