बाघिन अवनी की मौत से हाथियों के भी लगातार जान गंवाने का मुद्दा गरमाया

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नई दिल्ली। महाराष्ट्र में 13 लोगों की जान लेने वाली अवनी नाम की बाघिन को मार डाले जाने के बाद बाघों की सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच जंगलों में हाथियों की दुर्दशा भी मुद्दा बन रही है। भारत जैसे बड़े देश के जंगलों में अब महज 27 हजार हाथी ही रह गए हैं। जंगलों में इंसान की घुसपैठ इनके लिए भी अभिशाप बन गई है।

अभी बीते 26 अक्टूबर का मामला है, जब ओडिशा के ढेनकनाल जिले में बिजली का करंट लगने से 7 हाथियों की जान गई है। ये इस तरह का पहला मामला नहीं है। यहां अपनी फसल को बचाने के लिए किसान खेत के चारों ओर हाईटेंशन बिजली के बाड़ खड़े कर देते हैं और इन बाड़ों से चिपककर बीते 9 साल में 109 हाथी जान गंवा चुके हैं। यानी औसतन हर महीने एक हाथी की मौत इंसान के हाथ हुई है। वहीं, असम में मानव से संघर्ष से 2018 के पहले 10 महीने में 38 हाथियों को जान गंवानी पड़ी है। असम में 2011 तक 35.28 फीसदी जंगल थे। 2016 तक यहां जंगल महज 20 फीसदी ही रह गए।

जिन राज्यों में बीते 10 साल में हाथियों की मौत की सबसे ज्यादा घटनाएं हुई हैं, उनमें केरल का नाम सबसे ऊपर है। केरल में साल 2007 में 6068 हाथी थे। 2012 में इनकी संख्या 6422 हुई, लेकिन 2017 में ये घटकर 3054 हो गए। तमिलनाडु में 3867 हाथी गिने गए थे। 2012 में 4015 हाथी गिने गए और 2017 में 2761 हाथी ही रह गए। मेघालय में 2007 में 1811 हाथी थे। 2012 में इनकी संख्या जस की तस रही और 2017 में हाथियों की गिनती घटकर 1754 हो गई। उत्तरी बंगाल में साल 2007 में 325 हाथी थे। 2012 में ये 647 हुए और 2017 में संख्या घटकर 488 हो गई। झारखंड में 2007 में 624 हाथी थे। 2012 में 688 हाथी हुए, लेकिन 2017 में 679 हाथी ही रह गए।

साल 2012 में आखिरी बार हाथियों की सरकारी गिनती हुई थी। तबसे लेकर अब तक 2330 हाथी मारे जा चुके हैं। 2012 में जंगलों में 30 हजार हाथी थे। 2017 में ये संख्या गिरकर 27312 ही रह गई है। 2012 और 2017 के बीच 77 फीसदी यानी करीब 655 हाथियों की मौत करंट लगने, ट्रेनों से कटने, शिकार और जहर दिए जाने से हुई है। बता दें कि हाथियों के झुंड हर साल 350 से 500 वर्ग किलोमीटर के दायरे में विचरण करता है। इसी इलाके में इंसान ने घुसपैठ की है और ये हाथियों की मौत की बड़ी वजह बन रही है।

भारत में जंगली हाथियों की निर्बाध आवाजाही के लिए 101 कॉरीडोर चिह्नित किए गए हैं। इनमें से 70 फीसदी दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में हैं, लेकिन इन कॉरीडोर से गुजरने वाले हाथियों को मौत का पल-पल सामना करना पड़ता है। हालत ये है कि इन कॉरीडोर में से दो-तिहाई से होकर राजमार्ग गुजरते हैं। 74 फीसदी कॉरीडोर का दायरा एक किलोमीटर या उससे भी कम है। जिसकी वजह से हाथियों और इंसान के बीच आमना-सामना होता रहता है और जंगल का ये शानदार और सबसे समझदार जीव अपनी जान गंवा देता है।

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