बाघिन अवनी की अंतिम इच्छा: हमें बचाना है, तो जंगलों को बचे रहने दो !

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मुंबई। बीते कुछ महीनों में 13 लोगों को अपना निवाला बना चुकी अवनी नाम की बाघिन आखिरकार महाराष्ट्र में मार दी गई। उसे शुक्रवार देर रात गोलियों का निशाना बनाया गया। अवनी की मौत के साथ ही उन सवालों ने फिर सिर उठाया है, जो खत्म होते जंगल और इस शानदार जीव की मौत के बीच रिश्ता जोड़ते हैं।

भारत में प्रोजेक्ट टाइगर चल रहा है, लेकिन हकीकत ये है कि जंगलों की अंधाधुंध कटान और मानव से संघर्ष की वजह से 95 फीसदी बाघ uc खो चुके हैं। हर साल 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाने और बाघों की गिनती के आंकड़े जारी करने तक ही सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी मान ली है। विश्व वन्य जीव फंड ने साल 2016 में बताया था कि दुनियाभर में अब सिर्फ 3890 बाघ ही रह गए हैं। तबसे लेकर अब तक तमाम और बाघों को मौत की नींद सुला दिया गया है। जबकि, महज सौ साल पहले दुनियाभर के जंगलों में करीब एक लाख बाघ थे।
अवनी की मौत बाघों के संरक्षण की दिशा में बड़ा झटका है। उसके दो शावकों का भी अभी कोई पता नहीं है। मां का साथ न रहने के बाद अगर इन्हें जल्दी तलाशा न गया, तो भूख से दोनों शावकों की मौत को कोई नहीं रोक सकेगा। और अगर ऐसा हुआ, तो सिर्फ एक बाघिन ही नहीं मरेगी, कुल मिलाकर तीन बाघ असमय काल के गाल में समा जाएंगे। दरअसल, बाघों को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए ही नहीं गए। सबसे बड़ा कदम तो ये होना चाहिए था कि जंगलों को बचाया जाता।

जंगल तो जंगली जीवों के लिए ही हैं, लेकिन इंसान ने जंगलों को काटकर अपने रहने का इलाका बना लिया है। जहां जंगल हैं भी, वहां भी इंसान की घुसपैठ हो चुकी है। देश के जितने भी नेशनल पार्क हैं, वहां जाने पर दिखता है कि इंसान अपने फायदे के लिए कोर एरिया तक में घुसने से बाज नहीं आते। फिर जब बाघ या तेंदुआ अपने इलाके में घुसपैठ करने वाले इंसान को मार डालते हैं, तो अपनी गलती की जगह लोगों को उस जंगली जानवर की गलती नजर आने लगती है। हर एक मौत के बाद बाघ या तेंदुए को उसका दोषी बताकर उसे मार डालने के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाया जाता है और सरकारी तंत्र भी इंसानों का ही होने के नाते उस जानवर के बारे में नहीं सोचता, जो हमारी और आपकी भाषा में बोल नहीं सकता।

बोल सकती होती, तो अवनी नाम की बाघिन ने बताया होता कि वो इंसानों का कत्ल क्यों कर रही थी। वो बोलती कि उसने इंसानों के इलाके में जानबूझकर घुसपैठ नहीं की। जंगल ही जब नहीं बचा, तो उसे अपने और दोनों बच्चों के लिए भोजन कहां से मिलता। क्या कोई भी मां, भले ही वो बाघिन ही क्यों न हो, अपने बच्चों को भूखा मर जाने देती ? इस सवाल का किसी के पास जवाब नहीं ही मिलेगा।
दुनिया में बाघों की कई प्रजातियां पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं। इंडोनेशिया के जावा द्वीप और उसके आसपास मिलने वाले सुमात्रा टाइगर अब महज 400 की संख्या में हैं। दक्षिण-पूर्वी रूस और उत्तर-पूर्वी चीन में एक जमाने में साइबेरियाई बाघ बड़ी तादाद में थे, लेकिन अब ये महज 500 से कुछ ज्यादा ही हैं। भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, चीन और म्यांमार में रॉयल बंगाल टाइगर की प्रजाति के 2500 बाघ ही बचे हैं। वहीं, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, कंबोडिया और वियतनाम में मिलने वाले इंडो-चाइना प्रजाति के बाघ सिर्फ 350 ही बचे हैं। जबकि, दक्षिण-पूर्वी चीन से साउथ चाइना टाइगर की प्रजाति का एक भी बाघ नहीं बचा है।

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