खतरनाक हकीकत: भारत को गंभीर खतरे की ओर धकेल रहा है कोयले का इस्तेमाल

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नई दिल्ली। इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज यानी आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट भारत के लिए बड़े खतरे का इशारा कर रही है। ये खतरा पनपा है कोयले से। दुनियाभर में भारत कोयले का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाला दूसरा देश है। इस कोयले से जो कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उससे पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में है और अगर कोयले का इसी तरह इस्तेमाल जारी रहा, तो आने वाले कुछ दशकों में यहां जीवन के लिए खतरनाक परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।

आईपीसीसी की रिपोर्ट ने केरल में इस बार मॉनसून के दौरान बाढ़ से हुई विनाशलीला, उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लग रही आग और उत्तर और पूर्वी भारत में गर्म हवाएं चलने को कोयले से होने वाले कार्बन उत्सर्जन से जोड़ा है। रिपोर्ट कहती है कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाले दौर में लोगों के लिए भोजन और पानी मिलना तक मुश्किल हो सकता है।

माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट में जिस तरह कोयले से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में बढ़ोतरी की बात कही गई है, उसे देखते हुए आईपीसीसी की ओर से सरकारों से कहा जा सकता है कि वे कठोर कदम उठाएं। बता दें कि साल 1800 में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से अब तक धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक लाने का आईपीसीसी ने लक्ष्य रखा है। चीन के बाद भारत दुनिया में सबसे ज्यादा कोयले का इस्तेमाल करता है। भारत में कोयले से 60 फीसदी ऊर्जा हासिल होती है। जबकि, दुनिया में ये 27 फीसदी है। आईपीसीसी के मुताबिक कोयले का बढ़ता उपयोग 60 करोड़ लोगों को मौत के मुंह में धकेल सकता है।

साल 2015 में धरती का तापमान घटाने को लेकर पेरिस में सभी देशों ने संधि की थी। भारत ने उस वक्त वादा किया था कि वो 2018 के 40 फीसदी के मुकाबले वो 2030 तक कोयले से मिलने वाली उर्जा को 20 फीसदी के कोटे तक ले आएगा। साथ ही भारत की सरकार ने जंगलों में बढ़ोतरी, पर्यावरण के अनुकूल शहर और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट भी सुधारने की बात कही थी, लेकिन मौजूदा हकीकत ये है कि इन तीनों ही अहम मसलों पर कदम नहीं उठाए गए हैं।

गैर पारंपरिक उर्जा सिर्फ 20 फीसदी मिल रही है। 2017 तक जंगलों में सिर्फ 1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और भारत के 24 फीसदी हिस्से में ही जंगल हैं। सिर्फ 24 फीसदी सॉलिड वेस्ट का मैनेजमेंट नगर निकाय कर रहे हैं। पर्यावरण पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक इसी वजह से गर्मी के मौसम में खूब लू यानी गरम हवार चल रही है। अगर ऐसा ही जारी रहा, तो साल 2050 तक भारत में औसत तापमान 3 डिग्री तक बढ़ सकता है। 2014 से 2017 तक लू से भारत में 4800 लोग जान भी गंवा चुके हैं।
इसके अलावा अगर भारत में औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है, तो गंगा नदी में 20 फीसदी तक पानी कम हो सकता है। भारत में हर साल 2 लाख लोग साफ पानी न मिलने की वजह से मौत के मुंह में समा जाते हैं। मौजूदा हालात में 2050 तक ऐसी मौतों की तादाद में कई गुना बढ़ोतरी होने की आशंका पर्यावरणविद लगा रहे हैं।

पर्यावरणविदों के मुताबिक छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, पंजाब और चंडीगढ़ में कार्बन उत्सर्जन से होने वाली पर्यावरण को नुकसान सबसे ज्यादा है। इन राज्यों में गर्मी में बढ़ोतरी के साथ ही बारिश भी कम हो रही है और इसमें और गिरावट आ सकती है। जिससे किसानों के लिए बड़े मुश्किल हालात पैदा हो सकते हैं।

कोयले के इस्तेमाल से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड गैस लगातार बढ़ती है। हारवर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक इस खतरनाक गैस की वजह से चावल और गेहूं में पौष्टिकता की कमी हो जाती है। जिससे दुनिया की 1.9 फीसदी आबादी को जिंक जैसा जरूरी पदार्थ और 1 अरब 22 करोड़ लोगों को प्रोटीन की कमी का सामना साल 2050 तक करना पड़ सकता है। इनमें से 5 करोड़ लोग भारत के होंगे। यानी आंध्र प्रदेश की आबादी जितने लोगों को भोजन में जिंक नहीं मिलेगा और 3 करोड़ 80 लाख लोग प्रोटीन नहीं पा सकेंगे। हारवर्ड में पर्यावरण के जानकारों ने ये भी कहा है कि कोयले के लगातार इस्तेमाल से भारत में 50 करोड़ महिलाओं और बच्चों को तमाम बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है।

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