अध्ययन में खुलासा : यूरोपीय मूल के रोगाणु से आलू की फसल पर मंडराया खतरा

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नई दिल्‍ली। देश के लाखों किसानों की आमदनी का एक मुख्य जरिया आलू की फसल है। यही नहीं, आलू देश की बहुसंख्य आबादी के भोजन का प्रमुख अवयव भी है। लेकिन एक अध्‍ययन में सामने आया है कि यूरोपीय मूल के एक रोगाणु के कारण आलू की खेती पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार, इस रोगाणु के प्रकोप से आलू का आकार सिकुड़ जाता है और वह भीतर से सड़ने लगता है।

किसने किया अध्‍ययन ?

पश्चिम बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक आलू का अक्सर आयात करने वाले बांग्लादेश और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के आसपास इन रोगाणुओं की आबादी सबसे अधिक पाई गई है। पूर्वी और उत्तर भारत में इन रोगाणुओं की विविधता का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं। वैज्ञानिकों ने आलू की फसल में लेट ब्लाइट बीमारी के लिए जिम्मेदार ‘फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैन्स’ नामक रोगाणु के 19 रूपों का पता लगाया है। नई दिल्ली स्थित वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनुदान से किया गया यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में प्रकाशित किया गया है।

लेट ब्‍लाइट बीमारी के लिए जिम्‍मेदार

वैज्ञानिकों के अनुसार फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टैन्स रोगाणु का संबंध यूरोपीय मूल के 13_ए2 जीनोटाइप से है, जो वर्ष 2013-14 में पश्चिम बंगाल में लेट ब्लाइट बीमारी के प्रकोप के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जाता है। आलू की फसल में इस बीमारी से प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 8000 किलोग्राम तक गिरावट हो गई थी, जिससे किसान कर्ज आत्महत्या करने को मजबूर हो गए। लेट ब्लाइट आलू के खेत को 2-3 दिन के भीतर नष्ट कर देती है। इसका सबसे भयावह उदाहरण वर्ष 1840 के आयरलैंड में आलू के अकाल को माना जा सकता है, जिसके कारण वहां पर करीब 20 लाख लोग प्रभावित हुए थे।

क्‍या कहते हैं वैज्ञानिक ?

अध्ययन में शामिल पश्चिम बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ संजय गुहा रॉय ने बताया कि इस बात की पूरी संभावना है कि यह रोगाणु दक्षिण भारत से पूर्वी भारत में पहुंचा है। बांग्लादेश व नेपाल के रास्ते भारत की सीमा में पहुंचे रोगाणुओं की वजह से भी इनका विस्तार हुआ है, जो अब 19 रूपों में सामने आए हैं। यही कारण है कि कारण इन रोगाणुओं से लड़ने के लिए देश भर में नियंत्रण के एक जैसे उपाय नहीं अपनाए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्ष 2012 में बंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर रिसर्च के एक अध्ययन में यूरोप और ब्रिटेन से आयात की गई आलू की खेप के साथ आए 13-ए-2 रोगाणु को दक्षिण भारत के कई हिस्सों में लेट ब्लाइट बीमारी के लिए जिम्मेदार पाया गया था।

वैज्ञानिकों ने दिए सुझाव

वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि विदेशों से आयात किए जाने वाले बीजों की पड़ताल के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के जरिए लेट ब्लाइट रोगाणुओं के प्रसार को रोककर इस बीमारी के प्रकोप को कम करने में मदद मिल सकती है। डॉ. गुहा रॉय के अनुसार, ‘एशिया ब्लाइट’ और ‘यूरो ब्लाइट’ जैसे ज्ञान के आदान-प्रदान का अवसर प्रदान करने वाले मंचों के जरिये अन्य देशों के साथ समन्वय स्थापित करने से भी फायदा हो सकता है। इससे बीमारी के विस्तार और इसके नियंत्रण से जुड़ी जानकारियां जुटाई जा सकती हैं।’ डॉ. गुहा रॉय के अनुसार, ‘वैज्ञानिकों की टीम सात अलग-अलग फफूंदनाशियों के प्रति सूक्ष्मजीव रूपांतरणों की जांच में जुटी है। एक डाटाबेस भी तैयार किया जा रहा है, जिसकी मदद से रोगाणु के रूपों की पहचान की जा सकेगी और समय रहते नियंत्रण के उपाय किए जा सकेंगे।

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