स्टडी : बेहतर देखभाल की व्यवस्था से ही देश में कम हो सकती है मातृ मृत्यु दर

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नई दिल्‍ली। एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि मातृ मृत्यु दर कम करने और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार के लिए सार्वजनिक प्रसूति सेवाओं की निरंतरता के साथ-साथ व्यक्ति केंद्रित देखभाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में गुणवत्ता संबंधी बाधाओं को सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि कर दूर नहीं किया जा सकता। इसके लिए व्यक्तिगत देखभाल से जुड़ी सेवाओं की गुणवत्ता भी बढ़ानी होगी।

किसने किया अध्‍ययन ?

हरियाणा के गुरुग्राम स्थित पब्लिक हेल्थ फांउडेशन के शोधकर्ताओं ने यह अध्‍ययन किया है। इसके तहत अक्तूबर 2016 से फरवरी 2017 के दौरान उत्तर प्रदेश के दो जिलों कानपुर और उन्नाव के नौ सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसूति सेवाओं की गुणवत्ता का अध्ययन किया गया। इसके बाद अध्‍ययन से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण विश्व स्वास्थ्य संगठन के मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए निर्धारित मापदंडों के आधार पर किया गया। यह अध्ययन शोध पत्रिका प्लॉस वन में प्रकाशित किया गया है।

अध्‍ययन में क्‍या आया सामने ?

अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के विभिन्न चरणों में देखभाल संबंधी गुणवत्ता में बड़े पैमाने पर खामियां थीं। इनमें मुख्य रूप से हाथों की खराब हाइजीन, संक्रमित उपकरणों का उपयोग, अपर्याप्त देखभाल, प्रसव से पहले और प्रसव के बाद नियमित निगरानी की कमी, प्रसव कक्ष और उसके बाद रखे जाने वाले वार्ड में प्राइवेसी की कमी आदि शामिल हैं। इसके अलावा, कुछ मामलों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में पैसे मांगने और दुर्व्यवहार की घटनाएं भी देखने को मिलीं।

सामान्‍य जांचें भी नहीं होतीं

शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रसव से पहले करीब आधे मरीजों की सामान्‍य जांचें भी नहीं की जाती हैं। इनमें मरीजों का ब्लडप्रेशर, नब्ज, तापमान, हीमोग्लोबिन, मल-मूत्र में ग्लूकोज की मात्रा और गर्भस्थ शिशु के हृदय गति की जांच न करना प्रमुख कमी के रूप में उभरकर सामने आया। इसके अलावा परीक्षण के लिए कई मामलों में दस्तानों का उपयोग न करना और इस्तेमाल के बाद दस्तानों को मरीज के पास ही छोड़ देने जैसे मामले भी देखने को मिले।

मरीज खुद जुटाते हैं जरूरी सामान

अध्‍ययनकर्ताओं के अनुसार, प्रसव के दौरान कई मामलों में मरीज को दवाएं, कॉटन या पैड्स तक उपलब्ध नहीं कराए जाते और परिजनों को ये चीजें खुद जुटानी पड़ती हैं। कई केंद्रों पर बेड, चादर और बाथरूम भी साफ नहीं पाए गए। कुछ मामलों में तो महिला को मौखिक और शारीरिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। ज्‍यादातर मामलों में प्रसव के पूर्व या बाद में मां और शिशु की स्थिति के बारे में कोई जानकारी परिजनों से साझा नहीं की जाती और डिस्चार्ज के समय उन्हें देखभाल संबंधी सलाह भी नहीं दी जाती। परिजनों द्वारा कुछ पूछने पर भी उन्‍हें संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता। मरीजों को व्हीलचेयर/स्ट्रेचर न मिलने की बात भी सामने आई।

अस्‍पतालों में प्रसव के मामले बढ़े

भारत में स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों या अस्‍पतालों प्रसव के मामले वर्ष 2005-2006 के 39 प्रतिशत के मुकाबले वर्ष 2015-2016 में बढ़कर 79 प्रतिशत तक पहुंच गए थे। दरअसल, इसके लिए जननी सुरक्षा योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे की महिलाओं को संस्थागत प्रसूति कराने के लिए आर्थिक सहायता के रूप में नकद धनराशि मिलने को मुख्य रूप से जिम्मेदार माना जाता है। इसके बावजूद मातृ मृत्यु दर में उम्मीद के मुताबिक कमी नहीं आई है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और देखभाल पर सवाल खड़े होते हैं।

शोधकर्ताओं ने दिए सुझाव

अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉ. संगीता भट्टाचार्य कहती हैं, ‘सबसे अधिक खामियां प्रसव के दौरान और उससे पूर्व देखने को मिली हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों की गुणवत्ता में सुधार के लिए ढांचागत और मेडिकल सप्लाई से जुड़ी खामियों की पहचान के साथ-साथ नैदानिक, मरीजों की सुरक्षा, सूचनाओं को साझा करने, भावनात्मक सपोर्ट, अनौपचारिक भुगतान और स्टाफ के अपमानजनक रवैए जैसे मामलों का समाधान भी जरूरी है।’ उनका मानना है कि प्रसव संबंधी सेवाओं के दौरान निरंतर देखभाल में समझौता होने से समानता और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

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