शोधकर्ताओं ने बनाई टीबी की अचूक दवा, पूरी तरह ठीक हो गए मरीज

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नई दिल्‍ली। मल्टीड्रग रेसिस्टेंट टीबी का पूरी दुनिया में बहुत तेजी से फैलाव हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है फिलहाल टीबी के महज 55 फीसदी मरीजों का ही सफल इलाज हो पाता है। अब शोधकर्ताओं ने टीबी की एक ऐसी दवा बनाई है, जिसके इस्‍तेमाल से 80 फीसदी मरीज पूरी तरह ठीक हो गए। इसके ट्रायल के बाद दुनिया भर में टीबी के खिलाफ चल रही जंग में इस दवा को ‘गेमचेंजर’ माना जा रहा है।

चौंकाने वाले नतीजे

बेलारूस के डॉक्टरों ने टीबी के मरीजों पर कई महीनों तक बेडाक्विलिन नाम की इस दवा का दूसरे एंटीबॉयटिकों के साथ इस्तेमाल किया। इसके चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। जिन 181 मरीजों को यह नई दवा दी जा रही थी, उनमें से 168 लोगों ने इसका कोर्स पूरा किया और उनमें से 144 मरीज पूरी तरह ठीक हो गए। ये सभी मल्टीड्रग रेसिस्टेंट (MDR) टीबी के शिकार थे, यानी उनके ऊपर टीबी की दो प्रमुख दवाएं बेअसर साबित हो गई थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस शोध में 80 फीसदी लोग ठीक हो गए, यह किसी चमत्‍कार से कम नहीं है।

कैसे करती है असर ?

शोधकर्ताओं का कहना है कि दूसरी एंटीबॉयोटिक की तरह बेडेक्विलीन सीधे बैक्टीरिया पर हमला नहीं करती है, बल्कि इसकी बजाय वह उन एंजाइमों को निशाना बनाती है, जिन पर यह बैक्टीरिया अपनी ऊर्जा के लिए निर्भर हैं। हालांकि सभी मरीजों में इसका कुछ ना कुछ साइड इफेक्ट भी देखा गया, लेकिन यह उतना गंभीर नहीं था जितना पहले सोचा गया था। बता दें कि पिछले महीने ही संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश टीबी के खिलाफ पूरी दुनिया के लिए एक योजना बनाने पर सहमत हुए हैं। इसके साथ ही जरूरी दवाओं को सस्ता बनाने पर भी काम होगा।

कई देशों में सफल ट्रायल

बता दें कि बेलारूस में टीबी का शिकार होने वाले लोगों की संख्‍या दुनिया में सबसे ज्यादा है। बेलारूस में किए गए इस दवा के ट्रायल को पूर्वी यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया में भी आजमाया गया और यहां भी नतीजे काफी सकारात्‍मक रहे। इस हफ्ते के अंत में हेग में ट्यूबरक्लोसिस कांफ्रेंस में ट्रायल के इन नतीजों को जारी किया जाएगा।

गेमचेंजर साबित होगी यह दवा

इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्ट ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग डिजीज की वैज्ञानिक निदेशक पाउला फुजीवारा का कहना है, ‘इस रिसर्च से यह साबित हो गया है कि बेडाक्विलिन जैसी नई दवाएं टीबी के साथ जी रहे लोगों के लिए गेमचेंजर हैं।’ मिंस्क के रिपब्लिकन रिसर्च एंड प्रैक्टिकल सेंटर फॉर पल्मोनोलॉजी की प्रमुख रिसर्चर एलेना स्क्राहिना ने भी बेडाक्विलिन के नतीजों को ‘विश्‍वसनीय’ बताया है। अकेले भारत में ही दुनिया के एक चौथाई टीबी मरीज रहते हैं। यह नई दवा भारत जैसे विकासशील देशों के लिए काफी लाभदायक हो सकती है।

117 देशों में MDR टीबी

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, एचआईवी और इस तरह की दूसरी बीमारियों से अलग टीबी का इलाज अलग हो सकता है, लेकिन इसके लिए 6 महीने तक सख्ती के साथ इलाज कराना होता है। इसमें कई दवाइयां रोज लेनी पड़ती हैं। दुनिया के कई हिस्से में दवाइयां ठीक से नहीं रखी जातीं या फिर इलाज का कोर्स पूरा नहीं किया जाता। इसके कारण दवा प्रतिरोध बढ़ जाता है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि मल्टीड्रग रेसिस्टेंट टीबी दुनिया के 117 देशों में है।

2017 में टीबी से हुईं 17 लाख मौतें

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, टीबी के कारण वर्ष 2017 में 17 लाख लोगों की जान गई। यह दुनिया की उन सबसे घातक बीमारियों में है, जो वायु में संक्रमण के जरिए फैलती है। यह संख्या मलेरिया से हर साल होने वाली मौतों से करीब तीन गुना ज्यादा है। इसके साथ ही एचआईवी के पीड़ितों की होने वाली मौत की सबसे बड़ी वजह भी टीबी ही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि टीबी के मरीजों की ठीक ढंग से देखभाल नहीं होने के कारण यह तेजी से फैल रहा है।

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