सर्वे में खुलासा : 78 फीसदी महिलाएं नहीं कर पातीं अपने साथ हुए शोषण की शिकायत

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नई दिल्ली। इन दिनों खबरों और सोशल मीडिया पर #MeToo अभियान सुर्ख़ियों में है। रोज़ाना बॉलीवुड से लेकर राजनीति तक में किसी न किसी बड़े नाम का खुलासा हो रहा है।  नाना पाटेकर से शुरू हुआ यह अभियान अबतक कई बड़ी हस्तियों को अपनी चपेट में ले चुका है। ऐसे में एक सर्वे रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें बताया गया है कि लगभग 78 प्रतिशत महिलाएं कार्यस्थल पर किए गए यौन उत्पीड़न की शिकायत नहीं कर पाती हैं।

किसने किया सर्वेक्षण ?

मार्था फैरेल फाउंडेशन और पीआरआईए द्वारा इस वर्ष जून में दिल्ली-एनसीआर में घरेलू कामगार महिलाओं के बीच यह सर्वे किया है। पीड़िताओं ने सर्वेक्षण में बताया है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सबसे आम स्वरूप अनचाहा शारीरिक संपर्क है। सर्वेक्षण से जुड़े अक्षय गुप्ता ने कहा,‘सर्वेक्षण में लगभग 28000 लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं और अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में खुलकर बताया।’उन्होंने बताया कि लगभग 50 प्रतिशत लोगों ने बताया कि अनचाहा शारीरिक संपर्क कार्यालय में आम बात है, जबकि 31 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें अश्लील इशारे किए गए थे।

कानून को लेकर जागरूकता नहीं

सर्वे में यह भी सामने आया कि यौन उत्पीड़न संबंधी कानून को लेकर भी महिलाओं में जागरूकता का अभाव है। इससे गैर-संगठित क्षेत्र व घरेलू कार्यों  में लगीं करोड़ों महिलाएं अपने साथ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाती हैं। बता दें कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं निवारण) अधिनियम-2013 के तहत प्रत्येक जिले में एक स्थानीय समिति का गठन होना है, लेकिन सर्वे से पता चला है कि देश के सिर्फ 172 जिलों में ही ऐसा हो पाया है।

यौन शोषण का शिकार होती हैं महिलाएं 

मार्था फैरेल फाउंडेशन की निदेशक नंदिता भट्ट ने बताया कि घरेलू कामगार शहरी जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, लेकिन इनमें से गिनी-चुनी महिलाओं के पास ही औपचारिक कांट्रैक्ट होता है। ज्‍यादातर महिलाएं घरों में काम करती हैं और उनकी गिनती औपचारिक कार्यबल में नहीं होती है। घरेलू कार्य करते हुए अक्सर ये महिलाएं यौन शोषण का शिकार होती हैं, लेकिन कहीं पर भी अपनी शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं। सर्वे के दौरान भी सिर्फ 29 प्रतिशत घरेलू कामगारों ने यौन हिंसा होने की बात स्वीकार की।

गैर-संगठित क्षेत्र में 9 करोड़ महिलाएं

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, भारत के गैर-संगठित क्षेत्र में 9 करोड़ महिलाएं काम करती हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं निवारण) अधिनियम-2013 के अधीन औपचारिक एवं गैर-औपचारिक, दोनों क्षेत्रों की महिलाओं को शामिल किया गया है, लेकिन स्थानीय समितियों के न होने या उनके सक्रियता न होने के कारण अनौपचारिक क्षेत्र की कामगारों को कोई मदद नहीं मिल पाती है।

कौन-कौन आया #MeToo  के लपेटे में ?

बता दें कि #MeToo मामले में जो पहली शिकायत सार्वजनिक रूप से सामने आई थी, उसमे अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने 2008  में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान वरिष्ठ अभिनेता नाना पाटेकर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसके बाद बॉलीवुड अभिनेता आलोक नाथ, विवेक अग्निहोत्री, विकास बहल, रजत कपूर, साजिद खान और वरुण ग्रोवर समेत जैसे कई नाम सवालों के घेरे में हैं। इसके बाद विदेश मामलों के राज्यमंत्री एमजे अकबर पर तो कम से कम 12 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। एमजे पहले ऐसे राजनेता हैं, जिनके ऊपर इस तरह का आरोप लगा है। इसी तरह वरिष्‍ठ पत्रकार विनोद दुआ पर भी इसी तरह के आरोप लगे हैं।

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