भारत में है दुनिया का इकलौता गांव, जहां पैदा होते हैं सबसे ज्यादा जुड़वां बच्चे

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नई दिल्‍ली। भारत में केरल राज्‍य के एक गांव ने पूरी दुनिया को सकते में डाला हुआ है। वैज्ञानिक भी यहां का राज समझने में लगे हैं, लेकिन उन्‍हें कामयाबी नहीं मिली है। दरअसल, कोडिन्‍ही नामक इस गांव की खासियत यह है कि यहां दुनिया में सबसे ज्‍यादा जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं। इस गांव में घर, स्‍कूल, बाजार हर जगह हमशक्‍ल नजर आते हैं।

यहां जुड़वां बच्‍चों की दर दुनिया की 7 गुनी

कोडिन्‍ही गांव में प्रवेश करते ही नीले रंग के एक साइनबोर्ड पर लिखा है, ‘भगवान के अपने जुड़वां गांव, कोडिन्ही में आपका स्वागत है’। इस गांव में इतने जुड़वां बच्‍चे हैं कि पूरी दुनिया भर इस पर चर्चा चल रही है कि आखिर ऐसा इस गांव में ऐसा क्‍या है ? यहां हर 1,000 बच्चों में से 42 जुड़वां पैदा होते हैं। यह वैश्विक औसत का 7 गुना है। आम तौर पर दुनिया भर में 1,000  बच्‍चों में सिर्फ 6 बच्‍चे ही जुड़वां पैदा होते हैं। वर्तमान में इस गांव की आबादी करीब 2,500 है, जिनमें 450 जुड़वां बच्‍चे हैं।

जुड़वां बच्‍चों की कई कहानियां

कोच्चि से करीब 150 किलोमीटर दूर कोडिन्‍ही गांव में आपको जुड़वां बच्चों की कई कहानियां मिल जाएंगी। 16 साल की सुमायत और अफसायात यहां के मदरास्थल अनवर स्कूल में पढ़ती हैं। दोनों देखने में बिलकुल एक जैसी हैं। क्‍लास में टीचर भी कई बार असमंजस में पड़ जाते हैं कि वे सुमायत से बात कर रहे हैं या फिर अफसायात से। सुमायत बताती हैं, ‘ज्यादातर उनकी कोशिश होती है कि दोनों को एक साथ ही पुकार लें। स्कूल के प्रिंसिपल नजीब बताते हैं, ‘हमारे स्कूल में 17 जुड़वां बच्चों के जोड़े हैं। कभी कभार हमें उन्हें पहचानने में दिक्कत होती है और ऐसे में उन्हें शैतानी करने का भी मौका मिल जाता है, लेकिन यह कोई बड़ी समस्या नहीं है।’

एक जुड़वां भाई फुटबॉल टीम में

कोडिन्‍ही गांव में अरशद और आसिफ जुड़वां भाइयों का एक जोड़ा भी है। दोनों को फुटबॉल खेलने का शौक है, लेकिन दोनों की कोशिश रहती है कि वे एक ही टीम में खेलें, नहीं तो टीम वालों को उन्‍हें पहचानने में दिक्कत होगी। आसिफ बताता है, ‘हम दोनों ही मिडफील्ड खेलते हैं और कई बार दूसरी टीम वालों को समझ नहीं आता कि किसके पीछे भागना है।’

कोडिन्ही गांव की 70 साल की जुड़वां बहनें पथूटी और कुन्ही पथूटी (फोटो : साभार DW)

70 साल से जारी है सिलसिला

कोडिन्‍ही गांव की 85 फीसदी आबादी मुस्लिम है, लेकिन ऐसा भी नहीं कि हिन्दू परिवारों में जुड़वां बच्‍चे पैदा नहीं होते। स्थानीय लोग बताते हैं कि जुड़वां बच्चों के पैदा होने का सिलसिला यहां करीब 60 से 70 साल पहले शुरू हुआ। गांव के सरपंच बताते हैं, ‘जुड़वां बहनों का सबसे पुराना जोड़ा 70 साल पुराना है। मेरा तो यही मानना है कि यह अल्लाह की देन है।’ पथूटी और कुन्ही पथूटी जुड़वां बहनें हैं। इनकी उम्र 70 साल है और वे इसे किसी करिश्मे से कम नहीं मानतीं। पथूटी कहती हैं, ‘यह तो ईश्वर की मेहर है और कुछ नहीं। अब तो हम एक साथ तीन-तीन चार-चार बच्चे पैदा होते देख रहे हैं। इस सब का कोई जवाब नहीं है।’ सरपंच का कहना है कि बहुत सी महिलाएं किसी दूसरे गांव से शादी कर के यहां आती हैं, उनके भी जुड़वां बच्चे पैदा होते हैं।

किसी नतीजे पर नहीं पहुंची रिसर्च टीम 

कोडिन्‍ही गांव में जुड़वां बच्‍चों की गुत्थी को समझने के लिए दो साल पहले एक रिसर्च टीम यहां आई थी। इसमें भारत, जर्मनी और ब्रिटेन के शोधकर्ता थे। शोध के लिए टीम ने यहां के लोगों की थूक के सैंपल लिये ताकि इनके डीएनए को समझा जा सके। एक अन्य टीम ने लोगों की लंबाई, वजन, चेहरे की बनावट इत्यादि पर अध्‍ययन किया। शोधकर्ताओं ने जो डाटा इकट्ठा किए, उनसे वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके हैं। केरल के वैज्ञानिक ई. प्रीथम ने कहते हैं, ‘वैज्ञानिक दृष्टि से कुछ भी सिद्ध नहीं किया जा सका है। कुछ लोग कहते हैं कि यह जेनेटिक है लेकिन इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। अगर हमें किसी नतीजे पर पहुंचना है, तो कुछ और टेस्ट करने होंगे।’

तरह-तरह के कयास !

कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि यहां की हवा, पानी या फिर मिट्टी में कोई ऐसा रसायन मिला हुआ है, जिससे प्रजनन की प्रक्रिया पर असर पड़ता है। डॉ. श्रीबिजू ने 2008 में यहां एक शोध किया था। उस समय यहां 264 जुड़वां जोड़े मौजूद थे, इस बीच यह संख्या 450 पार कर गई है। डॉ. श्रीबिजू बताते हैं कि जुड़वां बच्चे पैदा करने वाली महिलाओं ने सामान्य रूप से गर्भ धारण किया और ऐसा अक्सर उनकी पहली गर्भावस्था में देखने को मिला। उन्होंने बताया कि पश्चिमी देशों के विपरीत यहां आईवीएफ जैसी तकनीक का इस्तेमाल नहीं होता है और ना ही महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां लेती हैं।

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