कैंसर की पहचान हुई आसान, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने बनाई पोर्टेबल डिवाइस

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नई दिल्‍ली। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने समय रहते कैंसर की पहचान करने के लिए एक अत्‍यंत छोटा उपकरण विकसित करने में सफलता पाई है। लंच बॉक्स से भी आधे आकार वाले इस उपकरण को आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। पिछड़े इलाकों में भी इस उपकरण की मदद से कैंसर की पहचान आसानी से की जा सकती है।  

इन कैंसरों की हो सकेगी पहचान ?

वैज्ञानिकों ने कहीं भी ले जाए जा सकने वाले इस उपकरण का नाम ‘टाइनी’ रखा है। इस उपकरण से कापोसी सारकोमा (KS) जैसे खतरनाक कैंसरों का जल्द पता लगाया जा सकेगा। KS कैंसर मुख्यत: लसीका और रक्त वाहिकाओं में विकसित होता है। इसके कारण त्वचा, मुंह और आंतरिक अंगों में जख्म बन जाते हैं। यह कैंसर 4 प्रकार होता है। एड्स से संबंधित KS कैंसर सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी देशों में काफी आम है। KS से पीड़ित मरीज यदि एचआईवी वायरस से संक्रमित होता है तो उसका एड्स से ग्रसित होना भी तय है। इसका जल्द पता चलने से उपचार अधिक प्रभावकारी हो सकता है, लेकिन अभी इसकी जांच में एक-दो हफ्ते का समय लग जाता है। नए उपकरण से जांच जल्‍दी हो जाएगी।

कैसे होती है पहचान ?

वैज्ञानिकों का कहना है कि कैंसर की जल्‍दी पहचान के लिए ‘टाइनी’ उपकरण को विकसित किया गया है। यह उपकरण न्यूक्लिक एसिड की मात्रा का पता लगाकर कैंसर की पहचान कर लेता है। यह बिजली व सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा को संग्रहित करता है। फलस्वरूप बिजली चली जाने पर भी यह उपकरण बंद नहीं होता है। यह उपकरण उन इलाकों में अधिक उपयोगी सिद्ध होगा, जहां बार-बार बिजली चली जाती है।

71 मरीजों पर हुआ परीक्षण

शोधकर्ताओं ने उपकरण की गुणवत्ता की जांच करने के लिए युगांडा के 71 मरीजों पर इसका परीक्षण किया। 94 फीसद मरीजों की जांच के दौरान टाइनी और क्वांटिटेटिव पॉलीमरेज चेन रिएक्शन (QPCR) से एक ही परिणाम आया। बता दें कि वर्तमान में न्यूक्लिक एसिड की जांच क्यूपीसीआर विधि से ही की जाती है।

कैंसर फैलाने वाले 10 जीन की पहचान

कैंसर से बचाव की खोज में लगे वैज्ञानिकों को इस क्षेत्र में एक बड़ी सफलता मिली है। उन्‍होंने 10 ऐसे जीन की पहचान की है, जिनकी वजह से कैंसर होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे कैंसर की रोकथाम में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मौजूदा डाटा के आधार पर कैंसर से जुड़े नए जीन की पहचान के लिए अल्फ्रेड नामक विधि विकसित की गई। इसकी मदद से कैंसर के खतरे वाले 10 नए जीन की पहचान की गई।

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