नदियों में प्रदूषण का पता लगाने को IIT Kanpur के वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

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लखनऊ। मौजूदा औद्यौगिक युग में वायु प्रदूषण की तरह जल प्रदूषण भी एक गंभीर चुनौती बनकर उभर रहा है। गंगा नदी मैदानी क्षेत्रों में बसे करीब 40 करोड़ लोगों के जीवन का आधार है। यह नदी भी लगातार प्रदूषित हो रही है। हालांकि गंगा को निर्मल करने के लिए तेजी से काम चल रहा है, लेकिन इसके नतीजे कब आएंगे अभी तय नहीं है। इस बीच वैज्ञानिकों ने नदियों में प्रदूषण का पता लगाने के एक नई तकनीक खोजी है।

क्‍या है यह तकनीक ?

दरअसल, वैज्ञानिकों का कहना है कि हवाई रिमोट सेंसिंग के जरिए भी नदियों में प्रदूषण के स्तर का पता लगाया जा सकता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), कानपुर के वैज्ञानिकों को प्रदूषण निगरानी की एक ऐसी ही तकनीक से गंगा नदी के जल की गुणवत्ता का पता लगाने में शुरुआती सफलता मिली है। अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर राजीव सिन्हा ने बताया, ‘हमारी टीम ड्रोन पर कैमरा लगाकर मल्टी-स्पेक्ट्रल और हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग तकनीक की मदद से गंगा में प्रवाहित प्रदूषकों की प्रकृति और विशेषताओं का पता लगाने के लिए काम कर रही है।’

कैसे किया अध्‍ययन ?

वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के दौरान मोनोक्रोम सेंसर युक्त चार कैमरों को एक छोटे एयरक्राफ्ट पर लगाया था। उन्‍होंने नदी में प्रदूषकों की मौजूदगी को दर्शाने वाले परावर्तित प्रकाश के तरंगदैर्ध्य को अलग करने के लिए खास ऑप्टिकल फिल्टर्स और आंकड़ों का उपयोग किया। आभासी वर्ण संयोजन (फाल्स कलर कम्पोजिट) विधि की मदद से नदी के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद तलछट या गाद के घनत्व का पता लगाने में भी वैज्ञानिकों को सफलता मिली है।

तो सभी तरह के प्रदूषण का चलेगा पता

प्रोफेसर सिन्हा का कहना है, ‘यह फिलहाल कम बजट की एक परियोजना थी। अगर और संसाधन हों तो वैज्ञानिक अधिक शक्तिशाली कैमरों की मदद से जलस्रोतों में जैविक, अजैविक और धात्विक प्रदूषण समेत विभिन्न तरह के प्रदूषण के बारे में भी पता लगा सकते हैं।’ उन्‍होंने बताया कि वैज्ञानिक एक सॉफ्टवेयर विकसित करने की कोशिश में भी जुटे हैं, जिससे नदी के प्रदूषित क्षेत्र तथा स्वच्छ क्षेत्र के बीच गुणात्मक अंतर और प्रदूषण के स्रोत का भी पता लगाया जा सकेगा।

क्‍या कहना है वैज्ञानिकों का ?

वैज्ञानिकों का कहना है कि नदियों में प्रदूषित जल आमतौर पर उसमें प्रवाहित होने वाले ठोस अपशिष्ट, रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD), जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) और पीएच के ऊंचे स्तर प्रदर्शित करता है। प्रकाश के परावर्तन से जलस्रोतों में मौजूद प्रदूषण के घनत्व का पता लगाया जा सकता है क्योंकि जलस्रोतों में तरल की सतह से प्रकाश का परावर्तन उसमें मौजूद प्रदूषकों की मात्रा पर निर्भर करता है। प्रदूषकों का स्तर अधिक होने पर उन्हें नंगी आंख से भी देखा जा सकता है, पर प्रदूषणकारी तत्वों का घनत्व कम होने की स्थिति में ऐसा संभव नहीं हो पाता।

पारंपरिक तरीके पर्याप्‍त नहीं

वैज्ञानिकों का कहना है कि नदियों के जल की गुणवत्ता का पता लगाने वाले पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं हैं। भारत में नदियों का विस्तृत तंत्र होने के कारण रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग उनमें प्रदूषण निगरानी के लिए करना अधिक प्रभावी हो सकता है। इस तकनीक का उपयोग जलस्रोतों को प्रदूषित करने वाले रासायनिक तत्वों की पहचान और प्रदूषण के घनत्व का पता लगाने के लिए भी कर सकते हैं। अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं क्योंकि इसके जरिए नियमित निगरानी की मदद से प्रदूषकों के स्रोत का पता लगाया जा सकेगा और नदियों को प्रदूषित करने वाली औद्योगिक इकाइयों पर नकेल कसी जा सकेगी।

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