प्रदूषण के खतरे से राष्ट्रीय राजमार्ग भी अछूते नहीं, वाहनों में बैठे लोग भी अनसेफ

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नई दिल्‍ली। माना जाता है कि ऊंची इमारतों, वाहनों की रेलमपेल, सघन आबादी और यातायात सिग्नलों के कारण शहरों में उत्सर्जित होने वाले प्रदूषक तत्वों की सांद्रता वातावरण में बढ़ जाती है, जिससे यहां की आबादी को गंभीर प्रदूषण  का सामना करना पड़ता है। हालांकि एक ताजा अध्‍ययन में पता चला है कि अब राजमार्ग भी प्रदूषण के खतरे से अछूते नहीं हैं। यहां तक कि राजमार्गों से गुजरने वाले वाहनों के भीतर बैठे लोग भी प्रदूषण के खतरे से सुरक्षित नहीं हैं।

किसने किया अध्‍ययन ?

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने शोध के दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों पर चलने वाले वाहनों के अंदर वायु-प्रदूषकों की मात्रा का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने अध्ययन में पाया कि निर्बाध आवागमन और खुलेपन के बावजूद राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘साइंस ऑफ द टोटल एन्वायरमेंट’ में प्रकाशित हुआ है।

कैसे किया अध्‍ययन ?

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान एनएच-30 और एनएच-65 पर भद्राचलम (तेलंगाना) से विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश) के बीच चलने वाली बसों और वातानुकूलित व गैर-वातानुकूलित कारों में बैठकर सफर करने वाले लोगों पर प्रदूषणकारी तत्वों के प्रभाव को समझने का प्रयास किया। अपने अध्ययन में उन्‍होंने 200 किलोमीटर के सफर में प्रति मिनट से लेकर प्रत्येक राउण्ड ट्रिप तक PM 2.5 और कार्बन मोनो आक्साइड के साथ-साथ तापमान, आपेक्षिक आर्द्रता और कार्बनाइऑक्साइड की मात्रा का आकलन किया।

क्‍या रहा शोध का नतीजा ?

शोधकर्ताओं का कहना है कि अध्‍ययन के दौरान उन्‍होंने पाया कि PM 2.5 की औसत सांद्रता वातानुकूलित कार में सबसे कम पाई गई, जबकि बस में यह 1.4 गुना और गैर-वातानुकूलित कार में 1.7 गुना अधिक आंकी गई है। इसी तरह कार्बन मोनो ऑक्साइड का स्तर गैर-वातानुकूलित कार में सबसे कम पाया गया, जबकि वातानुकूलित कार में इसका स्तर 77 प्रतिशत और बस में 15 प्रतिशत अधिक था। शोधकर्ताओं के अनुसार, एक ही मार्ग पर अलग-अलग वाहनों, जैसे बसों और गैर-वातानुकूलित वाहनों और वातानुकूलित कारों के भीतर PM 2.5, कार्बन मोनो ऑक्साइड और कार्बनडाईऑक्साइड का औसत घनत्व बाहरी वातावरण की तुलना में अलग हो सकता है। इन प्रदूषकों के घनत्व में सुबह और शाम के समय में की जाने वाली यात्रा, यात्रा में लगने वाले समय, गंतव्य की दूरी और वाहन में हवा के प्रवाह से भी फर्क पड़ता है।

कैसे नुकसान पहुंचाता है PM 2.5 ?

स्वास्‍थ्‍य पर वायु प्रदूषकों के पड़ने वाले प्रभावों के अध्ययन दर्शाते हैं कि PM 2.5  की अधिक मात्रा के सम्पर्क में लगातार रहने से एथीरोस्क्लीरोसिस, फेफड़ों में सूजन, हृदय की धड़कन में अनियमितता, रक्त आपूर्ति में कमी से उत्पन्न हृदय रोग, हृदयाघात जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इनके अलावा भी PM 2.5 सेहत को कई तरीके से नुकसान पहुंचाता है।

क्‍या कहते हैं विशेषज्ञ ?

पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण पण्ड्या के अनुसार, ‘राजमार्गों और शहरों में वायु प्रदूषकों के स्तर पर काफी शोध हो चुके हैं और कई जगह इनकी नियमित मॉनिटरिंग भी होती है, लेकिन वाहनों के अंदर वायु-प्रदूषकों का मापन एक नई पहल हो सकती है। इससे सफर कर रहे यात्रियों पर प्रदूषकों के प्रभावों का सटीक आकलन करने में मदद मिल सकती है।’ उनका मानना है कि भविष्य में इस तरह के और भी शोध यात्रियों के बीच पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने और राजमार्गों पर बेहतर प्रदूषण नियंत्रण रणनीति तैयार करने में उपयोगी साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों की वायु-गुणवत्ता और इन पर यात्रा कर रहे लोगों के स्वास्थ्य के दृष्टिगत सभी अपने-अपने नैतिक उत्तरदायित्वों को सही मायनों में समझें।

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