बच्चों और युवाओं को नशामुक्त करने के तरीके हम आइसलैंड से सीख सकते हैं

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रेजाविक। शुक्रवार दोपहर के तीन बजे हैं और आइसलैंड की राजधानी रेजाविक का लागार्डलर पार्क सूना दिख रहा है। कहीं कोई बुजुर्ग दिखता है। पार्क के आसपास के अपार्टमेंट और घरों के अलावा स्कूल भी हैं, लेकिन बच्चे कहीं नहीं दिख रहे। आखिर बच्चे हैं कहां ? हमारे साथ स्थानीय मनोचिकित्सक गुडबर्ग जॉनसन हैं। साथ ही अमेरिका के मनोचिकित्सा शिक्षक हार्वे मिल्कमैन भी हैं। मिल्कमैन रेजाविक यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं। गुडबर्ग बताते हैं कि करीब 20 साल पहले यूरोप में आइसलैंड के युवा सबसे ज्यादा शराब पीते थे। मिल्कमैन बताते हैं कि शुक्रवार रात को राजधानी की सड़कें खतरनाक हो जाती थीं। हर तरफ शराब के नशे में चूर युवा दिखाई देते थे।

हम एक बड़ी बिल्डिंग तक पहुंचते हैं। गुडबर्ग बताते हैं कि इसके भीतर स्केटिंग रिंक है। मिल्कमैन अपने अपार्टमेंट में चाय पीते हुए बताते हैं कि नशे के खिलाफ काम करने के लिए मुझे लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। मिल्कमैन जब न्यूयॉर्क में 1970 के दशक की शुरुआत में इंटर्नशिप कर रहे थे, तो उस वक्त तक एलएसडी की नशीली गोलियां लोगों तक पहुंच गईं थीं। तमाम लोग गांजा पीने लगे थे और ये बात लोग जानना चाहते थे कि कुछ खास किस्म का नशा लोगों को इतना क्यों भाता है।

मिल्कमैन ने अपनी थीसिस के लिए शोध करने पर जाना कि लोग तनाव से मुक्त होने के लिए या तो हेरोइन लेते हैं या एम्फीटामिन्स ड्रग का सेवन करते हैं। हेरोइन लेने वाले खुद को नशे में डुबो देना चाहते थे। जबकि, एमिफीटामिन्स ड्रग लेने वाले चाहते थे कि वो इस नशे के दम पर टक्कर ले सकें। उनकी थिसिस छपने के बाद अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ड्रग एब्यूस ने मिल्कमैन समेत कई रिसर्चर्स को रखा। संस्थान ये जानना चाहता था कि आखिर लोग किस तरह नशा लेना शुरू करते हैं ? वो नशा लगातार क्यों लेते रहते हैं ? कब वो इस स्तर पर पहुंच जाते हैं कि नशा उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेता है ? कब वो नशा लेना बंद करते हैं ? और कब वो दोबारा नशा करना शुरू कर देते हैं ?
मिल्कमैन कहते हैं कि कॉलेज जाने वाला छात्र बता सकता है कि उसने नशा करना कब से शुरू किया। दरअसल, नशे की चीजें आसानी से मिलती हैं, युवा खतरा उठाने लगते हैं। समाज से वो दूर होते हैं और डिप्रेशन में भी रहते हैं। लेकिन आखिर वे नशा करना क्यों जारी रखते हैं ? दरअसल, इसका जवाब “अहा” है। युवाओं से जब गलत बर्ताव लगातार होता है, तो वे नशे की ओर झुक जाते हैं।

डेनवर के मेट्रोपोलिटन स्टेट कॉलेज में मिल्कमैन ने रिसर्च में पाया कि दिमाग में रसायनों के उतार-चढ़ाव से लोग नशा करने लगते हैं। युवा चाहते हैं कि नशा करके वो समाज का सामना कर सकें। इसके लिए घर में छोटी-मोटी चोरी करने से शुरुआत करते हैं और बड़े होकर कार चोरी भी करने लगते हैं। शराब पीने से शुरुआत होती है, क्योंकि ये दिमाग को कुंद कर देता है। शराब पीने से किसी भी अच्छे-बुरे के बारे में सोचने की ताकत कम हो जाती है। कम मात्रा में पीने से शराब तनाव को भी कुछ हद तक दूर करती है। मिल्कमैन का कहना है कि लोग शराब पीने, कार खरीदने, पैसा जुटाने, सेक्स, कोकीन और अन्य चीजों की तरफ आसक्त हो सकते हैं। व्यवहार में बदलाव इंसान सबसे पहले चाहता है।

इस आइडिया से एक दूसरा आइडिया उनके दिमाग में आया। क्यों न ऐसा सामाजिक आंदोलन शुरू किया जाए, जिसमें लोग अपने दिमाग का रासायनिक खाका समझ सकें। लोग बिना नशा किए अपने होशो-हवास को बरकरार रख सकें। 1992 तक मिल्कमैन और उनकी टीम ने 12 लाख डॉलर का सरकारी ग्रांट हासिल कर भी लिया। इसके तहत युवाओं को अपराध या ड्रग्स से अलग कुछ और मुहैया कराना था। उन्हें इस काम में टीचरों, स्कूल में काम करने वाली नर्सों और काउंसिलर्स ने मदद की। 14 साल तक की उम्र के उन बच्चों को चुना गया, जिन्हें नशामुक्ति के लिए दवा की जरूरत नहीं थी। वे छोटे-मोटे अपराध करते थे और ड्रग्स लेते थे।

मिल्कमैन और उनकी टीम इन युवाओं को इलाज के लिए नहीं बुलाती थी। वो कहते थे कि हम आपको गाना, नाच, हिप-हॉप डांस, कला और मार्शल आर्ट्स सिखाएंगे। इरादा ये था कि बच्चों के दिमाग को पूरी तरह बदलाव की ओर ले जाया जाए और उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए जरूरी चीजें दी जाएं। ताकि उनमें तनाव को कम किया जा सके। इसी दौरान युवाओं को कुछ सीखने का मौका भी दिया गया। ताकि उनके विचारों को बदला जा सके और उनकी जिंदगी को आसान बनाया जा सके। साथ ही नशामुक्ति की दिशा में भी काम जारी रखा गया। मिल्कमैन कहते हैं कि युवाओं से कहा गया कि ये तीन महीने का प्रोग्राम है, लेकिन उनमें से कई पांच साल तक इससे जुड़े रहे।

1991 में मिल्कमैन को आइसलैंड में उनके शोध और आइडिया की वजह से बुलाया गया। वो यहां के टिंडार शहर में युवाओं को नशामुक्त करने के केंद्र से जुड़े। यहां युवाओं को अन्य बेहतर चीजें करने का मौका दियागया। यहीं पर मिल्कमैन की मुलाकात गुडबर्ग से हुई। तब गुडबर्ग साइकोलॉजी की पढ़ाई कर रहे थे। उस दौर से मिल्कमैन और गुडबर्ग अच्छे दोस्त हैं। मिल्कमैन लगातार आइसलैंड आते और नशामुक्ति के काम पर नजर रखते और अपने सुझाव देते। उनके काम पर आइसलैंड यूनिवर्सिटी की इंगा डोरा सिगफसडोतीर ने नजर डाली। वो वहां रिसर्च कर रही थीं। इंगा को अचरज हुआ कि युवाओं में ड्रग्स और शराब की लत दूर करने के लिए दूसरी स्वास्थ्यवर्धक चीजों को देना क्या सफल हो सकता है।

जिस बिल्डिंग में हम गए थे, वहां बैडमिंटन के लिए दो हॉल हैं और इतने ही हॉल टेबल टेनिस खेलने के लिए हैं। सामने के पार्क में एक एथलेटिक्स ट्रैक बना है। स्वीमिंग पूल भी है और वहां बच्चे खेलते दिखने लगे हैं। युवा अभी भी पार्क में नजर नहीं आ रहे। गुडबर्ग इसकी वजह बताते हैं। वो कहते हैं कि स्कूल के बाद युवा इन बिल्डिंग में या तो खेलने आते हैं या संगीत सीखने, नाचने या किसी और कला को जानने के लिए पहुंचते हैं। जो यहां नहीं आते, वे अपने पैरेंट्स के साथ घूमने जाने लगे हैं। आज हालात ये हैं कि यूरोप में आइसलैंड युवाओं की इस दशा को लेकर सबसे ऊपर के स्थान पर है। 1998 में जहां 15-16 साल के बच्चों में से 42 फीसदी नशा करते थे, वहीं ये दर 2016 में घटकर 5 फीसदी हो गई है। भांग खाने वालों की दर भी 17 फीसदी से घटकर 7 फीसदी रह गई है। हर दिन सिगरेट पीने वालों की दर भी 23 से गिरकर 3 फीसदी हो गई है। क्योंकि उन्हें मिल्कमैन और गुडबर्ग ने दूसरा कुछ करके खुश होने के लिए प्रेरित किया है।मिल्कमैन दावा करते हैं कि अगर दूसरे देशों में भी ऐसा ही किया जाए, तो युवाओं को नशामुक्त किया जा सकता है। साथ ही उनके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में हर साल किया जाने वाले करोड़ों का खर्च भी बच सकता है।

वो कहते हैं कि युवाओं से पूछना जरूरी है कि क्या कभी उन्होंने शराब पी, अगर पी तो आखिरी बार कब पी, कभी नशे में लड़खड़ाए, क्या कभी सिगरेट पी, एक दिन में कितनी सिगरेट पीते हो, अपने पैरेंट्स के साथ कितना वक्त गुजारते हो, क्या अपने पैरेंट्स के आप करीबी हो, आप और क्या चीजें करते हो ? 1992 में आइसलैंड में 14 से लेकर 16 साल तक के हर छात्र से सरकार ने यही सवाल पूछे थे। फिर 1995 और 1997 में सवाल दोहराए गए। पता ये चला कि राष्ट्रीय स्तर पर 25 फीसदी युवा हर रोज सिगरेट पीते थे। हालांकि बीते एक महीने में 40 फीसदी युवाओं ने शराब नहीं पी थी। वैसे कुछ स्कूल ऐसे थे, जहां के छात्र नशा करते थे। नशा करने और न करने वाले बच्चों के बीच अंतर को जाना गया। पता चला कि जो लोग खेल या किसी और चीज से जुड़े हैं, वे नशे से दूर हैं। साथ ही देर शाम तक घरों से बाहर रहने वालों में नशा करने की प्रवृत्ति ज्यादा देखी गई।

छात्रों का सर्वे करने के बाद आइसलैंड में कानून में बदलाव कर 18 साल से कम के लोगों को तंबाकू उत्पाद और 20 साल से कम उम्र वालों को शराब बेचने पर कड़ी रोक लगाई गई। पैरेंट्स और स्कूलों के बीच संपर्क को बढ़ावा दिया गया और लोगों को अपने बच्चों के साथ ज्यादा वक्त बिताने के लिए भी प्रेरित किया गया। एक कानून ये भी बनाया गया कि 13 से 16 साल के बच्चे और युवा गर्मी में रात 12 बजे और जाड़े के मौसम में रात 10 बजे के बाद घर से बाहर नहीं रह सकते। आइसलैंड में ये कानून अब भी लागू है। इसके अलावा खेलों में सरकार पैसा लगाने लगी। म्यूजिक, डांस और युवाओं के लिए अन्य चीजों पर भी सरकार ने जोर दिया। आइसलैंड में हर परिवार को लीजर कार्ड दिया जाता है। 35 हजार क्रोना मूल्य का ये कार्ड हर साल बच्चों को खेल या अन्य कलाएं सीखने के लिए ले जाने पर खर्च करना जरूरी होता है। कुल मिलाकर आइसलैंड में लोगों और सरकार के बीच सामंजस्य बनाया गया और इससे बच्चों और युवाओं को नशामुक्त करने की दिशा में बड़ी सफलता हाथ लगी।

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