रिसर्च : टीबी के इलाज में कारगर साबित हो सकती है अस्थमा की दवा

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नई दिल्‍ली। टीबी की बीमारी में दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता को देखते हुए शोधकर्ता इसके उपचार के लिए नई दवाओं की खोज के लिए गंभीरता से प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़़ी में बंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में पता लगाया है कि अस्थमा की एक प्रचलित दवा टीबी के इलाज में भी कारगर साबित हो सकती है।

शोध में क्‍या पता चला ?

शोधकर्ताओं ने विस्‍तृत अध्ययन के बाद पाया है कि ‘प्रॅनल्यूकास्त’ नामक यह दवा टीबी के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबर्क्युलोसिस (MTB) में एक विशिष्ट मेटाबॉलिज्‍म मार्ग को नष्ट कर देती है, जो इस बैक्टीरिया के जीवित रहने के लिए जरूरी है। इस दवा की खास बात है कि यह मानव कोशिकाओं को भी नुकसान नहीं पहुंचाती। इससे पहले यह जानकारी नहीं थी कि इस बैक्टीरिया के मेटाबॉलिज्‍म मार्ग को दवा के जरिए लक्ष्य बनाकर टीबी का उपचार किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दवा टीबी में दवाओं की विकसित होती प्रतिरोधक क्षमता की चुनौती से लड़ने में मददगार हो सकती है।

क्‍या है इस दवा की खासियत ?

आमतौर पर टीबी के उपचार में इस्‍तेमाल आने वाली दवाएं मानव कोशिकाओं में इस बीमारी के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया की संख्या को बढ़ने से रोकती हैं, लेकिन इसका विपरीत असर कोशिकाओं पर भी पड़ता है। इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने टीबी की बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया के अस्तित्व के लिए जरूरी उसके मेटाबॉलिज्‍म तंत्र को निशाना बनाया है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह बैक्टीरिया अपने अस्तित्व के लिए आर्गिनिन बायोसिंथेसिस नामक एक खास तंत्र का उपयोग करता है। इस तंत्र में अवरोध पैदा किया जाए तो यह बैक्टीरिया मर जाता है। ‘प्रॅनल्यूकास्त’ दवा को इस भूमिका के लिए कारगर पाया गया है।

खत्‍म हो जाते हैं टीबी के बैक्‍टीरिया

प्रो. अवधेश सुरोलिया के निर्देशन में पीएचडी कर रहीं अर्चिता मिश्रा का कहना है, ‘हमारे दृष्टिकोण में टीबी को दो तरीके से लक्षित करना शामिल है। हमने पाया है कि ‘प्रॅनल्यूकास्त’ एमटीबी के खिलाफ एक शक्तिशाली अवरोधक के रूप में कार्य करती है। अध्ययन में यह भी दर्शाया गया है कि यह दवा अपने लक्ष्य को कुछ इस तरह निशाना बनाती है कि मानव शरीर के भीतर टीबी के बैक्टीरिया के जीवित रहने की संभावना खत्म हो जाती है।’

सुरक्षित है इसका इस्‍तेमाल

प्रो. सुरोलिया के अनुसार, ‘प्रॅनल्यूकास्त का उपयोग टीबी के उपचार के लिए अभी इस्तेमाल हो रही दवाओं के साथ किया जा सकता है। इसके जरिए टीबी के इलाज को अधिक कारगर बनाया जा सकता है।’ शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि ‘प्रॅनल्यूकास्त’ का उपयोग पहले से हो रहा है, इसलिए इसके उपयोग से पहले नए सिरे से परीक्षणों की जरूरत नहीं है और यह मानवीय उपयोग के लिए सुरक्षित है। बता दें कि ‘प्रॅनल्यूकास्त’ एफडीए से मान्यता प्राप्त दवा है, जिसका उपयोग दमा-रोधी के रूप में पूरी दुनिया में होता है। इस अध्ययन के नतीजे ‘एम्बो मॉलिक्युलर मेडिसिन’ नामक शोध पत्रिका में प्रकाशित किए गए हैं।

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