ODF का लक्ष्य पूरा करने के लिए चाहिए कुशल मिस्त्री, जानिए क्यों

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चेन्नई। 2014 के बाद से स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच बंद करने का अभियान सरकार चला रही है, लेकिन इसकी राह में बड़ी बाधा बन रही है कुशल मिस्त्रियों की कमी।

सर्वे से सामने आया है कि ज्यादातर मिस्त्रियों को टॉयलेट या सोकपिट ठीक से बनाने के बारे में पता नहीं है। उन्हें इसे बनाने की कोई ट्रेनिंग नहीं मिलती। ऐसे में जो सोकपिट या टॉयलेट बनते हैं या बन रहे हैं, वे जल्दी खराब हो जाते हैं। उनमें लीकेज आ जाती है और भूजल का कचरा भी इकट्ठा हो जाता है। खराब तरीके से बने टॉयलेट और सोकपिट से गंदा पानी जाकर पेयजल में मिलता है और स्वास्थ्य को खराब कर देता है।

स्वच्छता के लिए टॉयलेट, उस तक लोगों की पहुंच, मल के निष्कासन का तरीका, गंदे पानी को बाहर न निकलने देने वाला सोकपिट बनाना जरूरी होता है। ये सबकुछ शहरी इलाकों में बनने वाले सीवर सिस्टम से बिल्कुल अलग होता है। भारत के शहरों में भी अभी 50 फीसदी से ज्यादा घरों में सरकारी सीवेज सिस्टम नहीं है। ऐसे में स्वच्छता के लिए ताबड़तोड़ टॉयलेट और सोकपिट बन रहे हैं और अकुशल मिस्त्रियों की वजह से ये पर्यावरण के लिए खतरा बन रहे हैं।

मिस्त्री का काम आमतौर पर एक बेटा अपने पिता से सीखता है। जब पिता ही टॉयलेट और सोकपिट बनाने में कुशल न हो, तो भला बेटे को ये हुनर कैसे मिल सकता है। साथ ही मिस्त्रियों को सोकपिट बनाने की ट्रेनिंग देने वाला कोई संस्थान भी नहीं है। सिर्फ 3 फीसदी मिस्त्री ही जानते हैं कि सोकपिट कैसा बनना चाहिए। साथ ही मानकों के तहत इसे बनाने की जानकारी भी नहीं होती है।

जो कुशल मिस्त्री हैं, उनका कहना है कि हम तो सुझाव ही दे सकते हैं। उसे मानना या न मानना मकान मालिक की मर्जी पर निर्भर करता है। बता दें कि सोकपिट बनाने का मानक ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड ने तय कर रखा है। ये मानक मकान के साइज और उसमें रहने वालों की संख्या पर निर्भर करता है, लेकिन आम तौर पर मकान मालिक बड़ा सोकपिट बनवाते हैं। ताकि उसकी सफाई बार-बार न करानी पड़े। देखा ये गया है कि पांच लोगों के परिवार के लिए मिस्त्री 80 फीसदी बार ऐसा सोकपिट बनाते हैं, जो 5 फुट गुणा ढाई फुट गुणा 3 फुट के मानक से साफी बड़ा होता है। सिर्फ 20 फीसदी मिस्त्रियों को पता होता है कि कितने बड़े परिवार के लिए कितना बड़ा सोकपिट बनाने की जरूरत है।

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