रिसर्च : डेंगू मच्‍छरों पर बेअसर साबित हुए कीटनाशक, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

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नई दिल्‍ली। डेंगू बरसात के मौसम में और उसके फौरन बाद यानी जुलाई से अक्‍टूबर में सबसे ज्‍यादा फैलता है। शुरू में सामान्‍य सा लगने वाला यह बुखार देरी या गलत इलाज की वजह से जानलेवा भी साबित हो सकता है। डेंगू को नियंत्रित करने के लिए अभी टीका नहीं आया है, ऐसे में इसकी रोकथाम संक्रमण फैलाने वाले मच्छरों पर नियंत्रण करके ही की जा सकती है। मच्छरों को मारने के लिए कई तरह के कीटनाशकों का प्रयोग होता है, लेकिन एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि इन कीटनाशकों के प्रति मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है, जिसके कारण अब वे बेअसर साबित हो रहे हैं।

किसने किया अध्‍ययन ?

दार्जिलिंग स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ बंगाल के प्राणी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने यह अध्‍ययन किया है। उन्‍होंने पश्चिम बंगाल के डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में कीटनाशकों के प्रति मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता का अध्ययन करने के बाद इस यह नतीजा निकाला है। डेंगू फैलाने वाले एडीस एजिप्टि और एडीस अल्बोपिक्टस मच्छर मुख्य रूप से डीडीटी, मैलाथिओन परमेथ्रिन और प्रोपोक्सर नामक कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी पाए गए हैं। अधिकांश डेंगू मच्छरों में टेमेफोस, डेल्टामेथ्रिन और लैम्ब्डासाइहेलोथ्रिन दवाओं के प्रति भी प्रतिरोधी लक्षण देखे गए हैं। इसके कारण इन कीटनाशकों का कोई खास असर मच्छरों पर नहीं पड़ता है।

कैसे किया अध्‍ययन ?

शोध के दौरान पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग और उत्तरी दीनाजपुर समेत पांच जिलों से मच्छरों के लार्वा, प्यूपा और वयस्कों को मानसून से पहले, मानसून के समय और मानसून के बाद की अवधि में एकत्र किया गया। इन मच्छरों पर डेल्टामेथ्रिन, लैम्बडेसीहेलोथ्रिन, मैलेथिओन, प्रोपोक्सर, परमेथ्रिन और डीडीटी के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। शोधकर्ताओं ने मच्छरों की मृत्यु दर के आधार पर उनकी कीटनाशकों को ग्रहण करने की क्षमता के बीच संबंध स्थापित किया। यह शोध ‘प्लॉस वन’ शोध पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

क्‍या निकला नतीजा ?

शोधकर्ताओं ने अध्‍ययन के बाद नतीजा निकाला कि पिछले 70 वर्षों से दुनियाभर में कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल होने वाले कीटनाशक डीडीटी के प्रति मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा है क्योंकि इसके उपयोग से सिर्फ 46 से 70.2 प्रतिशत मच्छर ही नष्ट हो पाते हैं। कुछ समय पूर्व उपयोग में लाए जा रहे डेलटामेथ्रिन और लैम्ब्डेसीहलोथ्रिन के लिए मच्छर अति संवेदनशील थे या फिर उनके लिए उनमें कम प्रतिरोध देखा गया था, इसीलिए मच्छरों की मृत्यु दर 100 प्रतिशत के करीब थी। हालांकि, प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से मच्छरों की अब सभी कीटनाशकों के प्रति संवेदनशीलता बहुत कम हो गई है।

क्‍यों विकसित हुई प्रतिरोधक क्षमता ?

वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता पैदा करने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं का पता लगाया है। शोध से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धीरज साहा का कहना है, ‘मच्छरों में मौजूद एंजाइम कार्बोक्सीलेस्टेरेसेस, ग्लूटाथिओन एस-ट्रांसफेरेसेस और साइटोक्रोम पी450 या संयुक्त रूप से काम करने वाले ऑक्सीडेसेस के माध्यम से मेटाबॉलिज्‍म से उत्पन्न डिटॉक्सीफिकेशन द्वारा प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हुई है। कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मच्छरों ने अपने शरीर में कीटनाशकों के नियोजित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए रणनीतियों का विकास कर किया है। इसी प्रक्रिया को कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता के विकास रूप में जाना जाता है।’

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