रिपोर्ट : अस्‍पतालों में प्रसव के बावजूद स्‍तनपान के मामले में भारत काफी पीछे

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नई दिल्‍ली। भारत में हर साल करीब 2.6 करोड़ शिशु जन्म लेते हैं, लेकिन इनमें से 1.50 करोड़ शिशु अपने जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान नहीं कर पाते। यह हालात तब हैं, जबकि 80 प्रतिशत महिलाएं अस्पतालों में प्रसव कराती हैं। यह खुलासा एक रिपोर्ट में हुआ है। अस्पतालों में प्रसव होने के बावजूद नवजात को सही समय पर स्तनपान नहीं कराने के पीछे सही देखभाल और जागरूकता की कमी को मुख्य कारण माना गया है।

किसने जारी की रिपोर्ट ?

नई दिल्ली में पिछले दिनों जारी की गई ‘अरेस्टेड डेवलपमेंट, द फिफ्थ रिपोर्ट ऑफ इंडियाज पॉलिसी एंड प्रोग्राम्स ऑन ब्रेस्टफीडिंग एंड इन्फेंट एंड यंग चाइल्ड फीडिंग-2018’ नामक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। इस रिपोर्ट में स्तनपान के संदर्भ में महिलाओं की सहायता संबंधी नीति और कार्यक्रमों की जांच-पड़ताल की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत स्तनपान सहायता सेवाओं के मामले में 97 देशों की सूची में 78वें नंबर पर है। इस रिपोर्ट को वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग ट्रेंड्स इनिशिएटिव (WBTI) की पहल पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों तथा एजेंसियों के कंसोर्टियम ने तैयार किया है।

क्‍या कहा गया है रिपोर्ट में ?

डब्ल्यूबीटीआई के अनुसार, स्तनपान और शिशु एवं छोटे बच्चों की आहार देने संबंधी नीतियों और कार्यक्रमों के मामले में भी भारत की स्थिति ठीक नहीं है। इस संबंध में वर्ष 2015 में भारत का स्कोर 100 में से सिर्फ 44 था, जो नाममात्र की बढ़ोतरी के साथ अब 45 हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि विभिन्न क्षेत्रों में शिशुओं व छोटे बच्चों को बेहतर आहार उपलब्ध कराने से जुड़ी बाधाएं दूर करने में महिलाओं को बहुत कम मदद मिल पाती है। इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, एचआईवी, आपदा प्रबंधन और श्रम प्रमुख रूप से शामिल हैं।

6 महीने तक 1.07 करोड़ शिशु ही कर पाते हैं स्‍तनपान

रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाने के कारण दो महीने तक शिशु को स्तनपान कराने वाली 1.88 करोड़ महिलाओं की संख्या शिशु के 6 महीने का होने तक गिरकर 1.07 करोड़ रह जाती है। यही नहीं, 6-8 महीने की आयु के 5 में से केवल 2 शिशु और छोटे बच्चे निरंतर स्तनपान के साथ ठोस आहार ले पाते हैं। इसी तरह, 06-24 महीने तक की आयु के 10 में से केवल एक बच्चा चार खाद्य समूहों की किस्मों वाला न्यूनतम स्वीकार्य आहार ले पाता है।

सरकार की फंडिंग कम

रिपोर्ट में पता चला है कि निरंतर स्तनपान, उसके प्रोत्साहन और सहायता के लिए सरकार की ओर से जो धनराशि निर्धारित की गई है, वह खर्च होने वाली रकम से बहुत ही कम है। ब्रेस्ट फीडिंग नेटवर्क ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता का कहना है कि सभी महिलाओं तक स्तनपान सहायता की पहुंच हो, इसके लिए सरकार को फंडिंग में बढ़ोतरी करनी होगी। इस धनराशि का इस्‍तेमाल डिब्बाबंद फूड्स को नियंत्रित करने, आपदाओं के दौरान उचित परामर्श और स्वास्थ्य सुविधाओं पर किया जा सकता है। साथ ही, इसके माध्‍यम से ब्‍लॉक स्तर पर परामर्श देने वाली टीम और ग्राम स्तर पर मातृ सहायता नेटवर्क की स्थापना और मां व शिशु की लगातार निगरानी की जा सकेगी।

सभी महिलाओं को लाभ पहुंचाना जरूरी

शिशु एवं छोटे बच्चों की आहार-पूर्ति संबंधी भारत सरकार की संचालन समिति ने वर्ष 2015 और 2017 में सभी प्रसव केंद्रों पर एक स्तनपान परामर्शदाता की नियुक्ति, इन्फेंट मिल्क सब्सिट्यूड एक्ट को असरदार ढंग से लागू करने और सूचना पुस्तिकाओं के जरिए सभी गर्भवती महिलाओं तक पहुंचने का फैसला किया था। पब्लिक हेल्थ रिसोर्स नेटवर्क की संयोजक डॉ. वंदना प्रसाद कहती हैं, ‘यह निराशाजनक है कि इस फैसले पर अमल नहीं किया गया और न ही इसके लिए समुचित फंडिंग की गई।’ डॉ. वंदना के मुताबिक, ‘मातृ स्वास्थ्य एवं पोषण में सुधार संबंधी भारत सरकार की प्रधानमंत्री वय वंदन योजना (PMVVI) को व्यापक बना दिया जाए तो उन महिलाओं को इससे लाभ हो सकता है, जो अपने कार्य और देखभाल की जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष करती रहती हैं। मातृत्व लाभ अधिनियम में भी अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए मातृत्व संबंधी अधिकार प्रदान करने संबंधी कोई खास व्यवस्था नहीं की गई है।

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