प्रसूताओं को होती है सरकारी अस्पतालों में तमाम परेशानी, यूपी में हुई स्टडी से खुलासा

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नई दिल्ली। मातृत्व स्वास्थ्य सेवा को बेहतर बनाकर भारत समेत विकासशील देशों में प्रसव के दौरान मौत की घटनाओं को कम किया जा सकता है। अब तक जिस तरह की स्वास्थ्य सेवा है, उससे सुरक्षित, प्रभावकारी, मरीजों पर आधारित, समय पर किसी की देखभाल नहीं हो सकी है। ऐसे में मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं और प्रसव के दौरान मौतों को रोकने के लिए व्यक्ति आधारित सेवा का महत्वपूर्ण रोल है।

यूपी में इसके लिए ऐसे दो जिले चुने गए, जहां काफी गांव हैं। इन गांवों में महिलाओं से बात कर प्रसव और माताओं की देखभाल के बारे में उनके विचार पूछे गए। चेकलिस्ट और पीसीसी के जरिए होने वाले सामान्य प्रसव के दौरान 23 मामलों पर सीधी निगाह रखी गई। इनमें देखा गया कि मरीज को भर्ती करने, प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान, प्रसव के बाद और अस्पताल से मरीज को घर भेजने में किस तरह की क्वालिटी पर जोर दिया गया। इससे मिले डेटा को परखा गया। जिन मामलों में कुछ अच्छा हुआ या जिन मामलों में कुछ खामी रही, उन्हें भी प्रसव के हर स्तर पर जांचा गया।

इससे पता चला कि प्रसूता को अस्पताल में दाखिल करने में तेजी दिखाई गई। सभी प्रसव इससे संबंधित जानकारों ने कराए और हर वक्त कम से कम अस्पताल का एक स्टाफ मौके पर मौजूद रहा। इस स्टडी के नतीजों को इसकी संरचना और तौर तरीके के तहत देखा गया और इस पर चर्चा हुई। नतीजों में पाया गया कि आधारभूत संरचना, सप्लाई और प्रसव के लिए जरूरी लोगों की मौजूदगी हर जगह थी। इससे पता चला कि प्रसव और प्रसव के बाद प्रसूताओं की देखभाल में कमी थी। इसमें ये भी पाया गया कि प्रसूताओं के लिए साफ-सफाई की व्यवस्था नहीं थी। इसके अलावा प्रसव कराने में इस्तेमाल होने वाले यंत्र भी साफ नहीं थे। साथ ही ये भी देखा गया कि प्रसव से पहले से लेकर प्रसव तक महिलाओं का चिकित्सकीय ध्यान नहीं रखा गया। प्रसव के बाद लेबर रूम और वार्ड में प्रसूताओं को निजता नहीं मिली। इसके अलावा कुछ जगह उनसे दुर्व्यवहार हुआ और पैसे की मांग भी की गई।

स्टडी के नतीजे कुल मिलाकर ये साबित करते हैं कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में प्रसूताओं की देखभाल का स्तर काफी खराब है। ऐसे में इस व्यवस्था को बेहतर करने के लिए पीसीसी को मजबूत करने की जरूरत है।

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