भीमा कोरेगांव केस – माओवादियों-एक्टिविस्ट्स में संपर्क के हैं ‘साक्ष्य’ : सुप्रीम कोर्ट

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  • शीर्ष कोर्ट ने एसआईटी जांच से किया इनकार, अभी 4 हफ्ते और नजरबंद रहेंगे एक्टिविस्ट्स

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल जनवरी में महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पांच एक्टिविस्ट्स की गिरफ्तारी में दखल देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्‍टया माओवादियों से संपर्क रखने के साक्ष्‍य हैं। ये सभी लोग कोर्ट के आदेश पर नज़रबंद थे। कोर्ट ने इनकी नजरबंदी अगले एक महीने के लिए और बढ़ा दी है। सर्वोच्‍च अदालत ने मामले की जांच एसआईटी से कराने की अपील भी ठुकरा दी है। कोर्ट ने पुणे पुलिस से आगे जांच जारी रखने को कहा है।

क्‍या कहा सर्वोच्‍च अदालत ने ?

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने 2-1 के बहुमत से अपने फैसले में कहा, ‘इस मामले में एक्टिविस्‍ट्स की गिरफ्तारी दुर्भावनापूर्ण नहीं दिखती।’ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस खानविलकर ने कहा कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक असहमतियों की वजह से नहीं हुईं, बल्कि प्रथम दृष्‍टया ऐसे साक्ष्‍य मिलते हैं, जिससे माओवादियों के साथ उनके संबंधों के बारे में पता चलता है।’

‘आरोपी नहीं चुन सकते जांच एजेंसी’

कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी खुद जांच एजेंसी का चयन नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एसआईटी जांच की अपील खारिज करते हुए पुणे पुलिस को मामले की जांच जारी रखने को कहा है। हालांकि कोर्ट ने इन एक्टिविस्‍ट्स को राहत देते हुए निचली अदालत में अपील करने की अनुमति दी है। बता दें कि कोर्ट ने 20 सितंबर को सुनवाई के बाद इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। महाराष्ट्र पुलिस ने एक्टिविस्‍ट्स को 28 अगस्त को गिरफ्तार किया था और वे 29 अगस्‍त से ही अपने घरों में नजरबंद हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ की राय अलग

पीठ में शामिल तीसरे जज जस्टिस चंद्रचूड़ का फैसला अलग रहा। उन्होंने इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस की जांच के तरीकों पर पर सवाल उठाए और एक्टिविस्‍ट्स की गिरफ्तारी को उनकी ‘आवाज दबाने का प्रयास’ बताया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, ‘यह कोर्ट की निगरानी में एसआईटी जांच के लिए बिल्कुल उपयुक्‍त मामला है।’ उन्‍होंने पुणे पुलिस के रवैये पर भी सवाल उठाए और कहा कि मामले के कोर्ट में होने के बाद भी पुलिस ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की और ‘पब्लिक ओपिनियन’ बनाने का प्रयास किया।’

क्‍या था मामला ?

बता दें कि पिछले महीने सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, वरवर राव, वरनॉन गोंज़ाल्विस और अरुण फ़रेरा को देश के अलग-अलग शहरों से गिरफ़्तार किया गया था। इतिहासकार रोमिला थापर ने  इनकी गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्‍होंने सभी पांचों कार्यकर्ताओं की तत्‍काल रिहाई और उनकी गिरफ्तारी मामले की एसआईटी से जांच कराने की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें नज़रबंद रखने का फ़ैसला सुनाया था। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वालों में इतिहासकार रोमिला थापर के अलावा अर्थशास्‍त्री प्रभात पटनायक व देवकी जैन, समाजशास्‍त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे और मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले माजा दारुवाला भी शामिल हैं।

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