वैज्ञानिकों का दावा – समुद्र के भीतर दीवार बनाएं तो रुक सकता है ग्लेशियरों का पिघलना

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लंदन। समुद्र तल को सामान्य रखने में ग्लेशियर अहम रोल निभाते हैं। हालांकि ग्‍लोबल वार्मिंग की वजह से पिछले कुछ वर्षों में ग्‍लेशियरों के पिघलने की रफ्तार काफी तेज हुई है। इससे चिंतित वैज्ञानिकों ने ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने के लिए नया तरीका खोजने का दावा किया है। वैज्ञानिकों ने प्रयोग के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उनका मानना है कि समंदर में अगर धातु की दीवार बना दें तो इससे ग्लेशियरों का पिघलना काफी हद तक कम हो जाएगा।

किसने तैयार की है रिपोर्ट ?

यह रिपोर्ट प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल वोलोविक और फिनलैंड की यूनिवर्सिटी के जॉन मूर ने लिखी है। दरअसल, 2016 में नासा की जेट प्रपुल्शन लेबोरेटरी ने बताया था कि पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ काफी तेजी से पिघल रही है। नेचर कम्युनिकेशन में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया था कि पहाड़ के नीचे मौजूद गर्म पानी बर्फ पिघलने का कारण हो सकता है। इसके बाद वोलोविक और मूर ने दुनिया के सबसे बड़े ग्लेशियर में से एक थ्वाइट्स का अध्ययन किया।

क्‍या कहा गया है अध्‍ययन में ?

अध्ययन में बताया गया कि इस प्लान के तहत 300 मीटर ऊंची दीवार बनानी होगी, जिस पर 0.1 क्यूबिक किमी से 1.5 क्यूबिक किमी धातु लगेगी। ‘क्रायोस्फियर’ जर्नल में प्रकाशित यूरोपियन जियोसाइंस यूनियन रिपोर्ट के मुताबिक, समंदर में बनी दीवारें ग्लेशियरों के पास गर्म पानी को नहीं पहुंचने देंगी। ऐसे में हिमखंड टूटकर समुद्र में नहीं गिरेंगे। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने में भी कमी आएगी और तटीय शहरों के डूबने का खतरा कम होगा। हालांकि, इस पर काफी पैसा खर्च होने का अनुमान है।

इसी तकनीक से हांगकांग में बना एयरपोर्ट

इससे पहले इस तकनीक से दुबई का पाम जुमैरा पास और हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाया गया था। दुबई के पाम जुमैरा के लिए 0.1 क्यूबिक किमी धातु से दीवार बनाई गई थी, जिस पर 86 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। वहीं, हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 0.3 किमी धातु से दीवार बनाने का बजट डेढ़ लाख करोड़ रुपए था।

कामयाबी की कितनी उम्मीद ?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, समंदर में धातु की दीवारें दुनिया का सबसे बड़ा सिविल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट हो सकता है। यह दुनिया का सबसे चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट होगा। हालांकि इसके कामयाब होने की उम्मीद महज 30% ही है। वोलोविक और मूर का भी मानना है कि यह प्रयोग जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए उत्सर्जन में कमी लाने के एक शॉर्ट टर्म प्लान की तरह है। ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने के लिए कुछ नया सोचना पड़ेगा। कंप्यूटर मॉडल्स के जरिए वैज्ञानिक बर्फ पिघलने की वजह जानने की कोशिश कर रहे हैं।

7 फीट बढ़ सकता है समुद्र का जलस्तर

साइंस जर्नल ‘क्रायोस्फियर’ के मुताबिक, समुद्र के जलस्‍तर को सामान्य रखने में ग्लेशियर की बहुत अहम भूमिका होती है, इसलिए इनको पिघलने से रोकने के लिए कुछ उपाय करना बहुत जरूरी है। पिछले दशक में पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ पिघलने की दर में 70% का इजाफा हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में सिर्फ थ्वाइट्स ग्लेशियर ही सभी समुद्रों का जलस्तर बढ़ा सकता है। अगर वह मौजूदा रफ्तार से पिघलता रहा तो वर्ष 2100 तक समुद्र का जलस्तर 7 फीट तक बढ़ सकता है।

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