इन तरीकों से सेक्स की जरूरत को शांत करती हैं गांव की महिलाएं !

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जब उसने पहली बार अपने पति के साथ सेक्स किया, तो वो 17 साल की थी और पति 25 साल का। वो महाराष्ट्र के सांगली जिले के दुग्ध उत्पादक हैं। शादी के पांच साल के भीतर उनके दो बच्चे भी हो गए। शुरू में सेक्स ठीक लगता था। इसके बाद महिला के पति ने शराब पीना शुरू कर दिया और आगे चलकर शराब की ये मात्रा बढ़ती गई। शराब ने पति-पत्नी के बीच रिश्तों को कमजोर कर दिया और सेक्स की इच्छा को भी। ज्यादातर वक्त पति शराब के नशे में रहता और सेक्स की तरफ उसका रुझान भी नहीं दिखता। महिला को प्यार चाहिए था, लेकिन साथ ही वो सेक्स भी चाहती थी

अंग्रेजी अखबार The Mint में अशवाक मसूदी लिखती हैं, महिला ने अपने पति से कहा कि उसका जिस्म सेक्स की इच्छा से जल रहा है। पति ने जवाब दिया, तुम्हारे दो बच्चे हैं, तुम्हें शर्म नहीं आती। तुम्हारे दिमाग में ये सब बातें कौन भर रहा है, कोई यार है क्या ? उसने इसके बाद सेक्स के बारे में अपने पति से कुछ भी कहना छोड़ दिया। वो खेत जाती। बच्चों को तैयार करती। मवेशियों को चारा-पानी देती और दूध बेचती। इस बीच, उसका पति लगातार बीमार होता गया।

इस बीच, पति के एक रिश्तेदार ने मदद देनी शुरू की। वो उसके पति को अस्पताल ले जाने लगा। उसके लिए दवाइयां खरीदने लगा और पैसे भी खर्च करने लगा। ऐसे में महिला का झुकाव अपने पति के रिश्तेदार की तरफ होने लगा। पति का रिश्तेदार भी शादीशुदा था, लेकिन महिला और उसके बीच प्रेम संबंध पनपने लगे। फिर दोनों के बीच सेक्स हुआ। पति के साथ महिला को सेक्स में लगता था कि ये दूसरे काम जैसा ही है, लेकिन पति के रिश्तेदार के साथ सेक्स का दूसरा ही रूप उसके सामने आया। 33 साल में पति के रिश्तेदार से संबंध बनाने वाली ये महिला अब 36 साल की है। वो कहती है, ‘ये बिल्कुल वैसा था, जैसा फिल्मों में देखते हैं।’ हम अपने कपड़े उतार देते थे। फिर एक-दूसरे का जिस्म निहारते थे। जब भी सेक्स करते, 2-3 घंटे बिस्तर पर साथ रहते। ये किसी काम जैसा नहीं था, मैंने पहली बार जाना कि सेक्स क्या होता है।

महिला अपने नए संबंध को बताती कि वो सेक्स के दौरान क्या चाहती है। वो भी अपनी इच्छा बताता। गांव के लोगों को दोनों हंसते-खिलखिलाते दिखने लगे। कभी-कभी लोगों ने दोनों को एक-दूसरे के करीब भी देखा और जैसा कि होता है, दोनों के रिश्तों को लेकर गांव में काना-फूसी शुरू हो गई। गांववाले जानते थे कि महिला का पति बीमार है। वो सेक्स नहीं कर सकता। ऐसे में चर्चाएं थम गईं। मानो गांव के लोगों ने महिला और उसके नए संबंध को मौन मंजूरी दे दी। महिला के पति की 2016 में आखिरकार मौत हो गई। पति का रिश्तेदार भी जिंदगी से चला गया। अब इस महिला का खुद से 14 साल छोटे शख्स से संबंध है।

इस बारे में पूछने पर महिला कहती है, ‘पेट की भूख के बारे में तो सभी बातें करते हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों जताते हैं कि जिस्म की कोई भूख नहीं है ?’वो कहती है कि आपको ऐसा कोई चाहिए, जो मानसिक और शारीरिक तौर पर आपको संतुष्ट कर सके। एक महिला की जिंदगी का मतलब ये नहीं है कि वो खेत में काम करे, घर पर काम करे, दो जून की रोटी खाए और दिन के अंत में लकड़ी के एक लट्ठे की तरह गिरी नजर आए। ‘मुझे जरूरत है अभी…क्या करूं ? सेक्स हमारी जिंदगी की जरूरी चीज है। ये जिंदगी और दिमाग को तरो-ताजा करता है। भले ही हममें से कुछ इससे इनकार करते हैं।’

खासकर महिलाओं को सेक्स, इच्छा, सेक्स की जरूरत ऐसे विषय नहीं हैं, जिसे लेकर इस देश में आसानी से चर्चा होती है। वजह ये है कि यहां आधी आबादी को सेक्स के मुद्दे पर तमाम रोक-टोक का सामना करना होता है। फिर भी ग्रामीण इलाकों में दरवाजे के पीछे महिलाओं की सेक्स की इच्छा को लेकर तमाम अज्ञात कहानियां बंद पड़ी हुई हैं।

दिसंबर 2017 में प्रकाशित केंद्र सरकार का राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे भी इसकी तस्दीक करता है। इस सर्वे में कई सच सामने आए हैं। मसलन शहरी महिलाओं के मुकाबले ग्रामीण महिलाएं उम्र में 2 साल पहले ही सेक्स करती हैं। ग्रामीण महिलाओं में सेक्स ज्यादा बार होता है और अपने जीवन में वो एक से ज्यादा व्यक्ति के साथ सेक्स संबंध बनाती हैं।

द मिंट अखबार ने इस खबर के लिए जिन ग्रामीण महिलाओं से बात की, उनमें पाया कि वे सेक्स को लेकर विचारों में काफी खुलापन रखती हैं और इसे जिंदगी की जरूरी चीज मानती हैं।

बैंगन और बेलन
सांगली की जिस महिला से बातचीत की गई। उसके गांव से कुछ मील दूर ही चारण गांव है। इस गांव में कुछ महिलाएं हाल ही में हुई एक घटना को लेकर आपस में हंसी-ठिठोली करती दिखीं। दरअसल, मामला कुछ यूं है कि 20 साल की एक युवती में सेक्स की इच्छा जागी, लेकिन वो किसी पुरुष से संबंध बनाकर पाप नहीं करना चाहती थी। ऐसे में उसने खुद मसाला कूटने में इस्तेमाल होने वाले इमाम-दस्ता का दस्ता अपनी योनी में डाला और सेक्स का आनंद हासिल किया। ये बात उस युवती ने अपनी पड़ोसन को बताई, जिसने तुरंत दूसरों को ये जानकारी दी। गांव की महिलाओं से ये बात पुरुषों को भी पता चल गई। 32 साल के एक किसान के मुताबिक, ‘उसे आराम मिला, लेकिन गांव में लड़की का मजाक भी काफी उड़ा।’ गांव में ऐसे ही कई और किस्से हैं। किस तरह एक महिला ने अपनी योनी में बैंगन डाल लिया और डंठल टूटकर बैंगन अंदर ही रह गया। फिर महिला को अस्पताल ले जाना पड़ा और पूरा मसला गांव में चटखारे लेकर चर्चा का विषय बन गया।

योनी में बैंगन डालने पर महिला की गांव में भले ही जगहंसाई हुई हो, लेकिन दूसरी महिलाएं उससे सहानुभूति रखती हैं। 43 साल की एक महिला कहती हैं,‘इच्छा आई तो क्या करे कोई ? इतनी तकलीफ होती है।’ इस महिला का कहना था कि गांव की महिलाओं को सेक्स की भूख मिटाने के लिए सदियों से चले आ रहे तरीके पता हैं। इनमें से एक तरीका योनी में नारियल का तेल लगाकर उसे रगड़ना भी है।

सेक्स की इच्छा को लेकर भारत के गांवों में चर्चा काफी सामान्य है। लोग हालांकि इस बारे में बात करते हैं कि दूसरे ने क्या किया, न कि इस पर कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। पता चला कि महाराष्ट्र में सेक्स की भूख को शांत करने के ऐसे तमाम किस्से बीते एक साल में हुए। एक महिला ने अपने पति को इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वो रात में काम करता था औऱ दिन में सेक्स करना चाहता था। एक अन्य महिला ने अपने पति को इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वो कम अंतराल पर काफी सेक्स करना चाहता था। एक अन्य महिला ने अपने पति की अप्राकृतिक सेक्स की इच्छा को अपने मायकेवालों के सामने ही ठुकरा दिया। एक अन्य मामले में एक महिला अपनी बहन के प्रसव के वक्त उसके ससुराल पहुंची और फिर बहन के देवर के साथ सेक्स करके प्रेग्नेंट हो गई। हालांकि, बहन का पति अच्छा व्यक्ति था और उसने उससे शादी कर ली।

दिल्ली में लैंगिकता और शिक्षा को लेकर काम करने वाली “निरंतर” नाम के एनजीओ की निदेशक अर्चना द्विवेदी कहती हैं, ‘ग्रामीण इलाकों में लोग गंभीरता से मानते हैं कि सेक्स एक जरूरी चीज है। इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता कि उनकी सेक्स की भूख किस तरीके से शांत हो रही है। कोई ऐसा गांव बताइए, जहां जीजा, देवर, ससुर से जिस्मानी रिश्ते न बनते हों। जाहिर है, इस तरह के सारे संबंध जबरदस्ती भी बनाए जाते हैं और आपस में सहमति से भी बनते हैं।’

2005-06 से शुरू करके तीन साल तक निरंतर ने कार्यशाला की। उन्होंने इसमें चार संस्थानों को जोड़ा और जानना चाहा कि उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं किस तरह सेक्स को देखती हैं। उनको तमाम बातें पता चलीं। इनमें से एक थी कि गांव की महिलाएं जाति, सामाजिक हैसियत और धर्म के आधार पर एक-दूसरे से अलग होने के बावजूद शहरी महिलाओं के मुकाबले सेक्स के संबंध में ज्यादा खुले विचार रखती हैं। इसी तरह की एक कार्यशाला में ग्रामीण महिलाओं के एक समूह से सेक्स के जानना चाहा गया। महिलाओं ने इसके जवाब में 64 तौर-तरीके बताए। इनमें योनी में उंगली डालने और बगल में पुरुष के लिंग को दबाकर सेक्स करने के अलावा योनी और लिंग के प्यूबिक हेयर यानी बालों को सहलाने जैसे तरीके भी थे।

एक अन्य कार्यशाला में एक महिला ने कहा, ‘अगर मैं चार रोटी खाना चाहती हूं और घर में मुझे तीन रोटी ही मिल सकती है, तो मैं चौथी रोटी के लिए पड़ोसी के पास जाने की सोच सकती हूं।’ एक अन्य महिला ने कहा, ‘पर्दे में ही जर्दा बनता है।’ यानी छिपकर ही असली काम होता है।

सांगली जिले के कोकरूड गांव में 36 साल की महिला को गांव की बाकी महिलाओं में बहादुर माना जाता है। ये महिला संयुक्त परिवार में रहती है। उसका पति उससे 11 साल बड़ा है। शादी के बाद ही महिला का पति मुंबई चला गया। वो साल में दो बार चार-पांच दिन के लिए आता। जब वो मुंबई में रहता, उसका भतीजा, जो अपनी चाची की ही उम्र का था, महिला से जबरन सेक्स करने की कोशिश करता था। महिला ने उसका काफी विरोध किया, लेकिन एक दिन अपने पति के भतीजे को सेक्स की मंजूरी दे दी। जल्दी ही महिला को अपने नए संबंध से सेक्स का मजा आने लगा। जिंदगी में आया ये नया मर्द सेक्स में कई नए तरीके अपनाता था, जिसे महिला पति के साथ करने में अप्राकृतिक मानती थी। महिला कहती है, ‘मेरा पति मुझे पेट के बल लिटा देता था। वो मुझे पॉर्न फिल्में दिखाता था। मुझे अपने मुंह से गंदी चीजें करनी होती थीं। मुझे लगता था कि वो एक जानवर है।’ इस महिला का पति अब जीवित नहीं है, लेकिन वो फिर भी अपने ससुराल में रहती है। उसके ससुरालवालों को भी भतीजे से उसके संबंधों का पता है। भतीजा शादीशुदा भी है, लेकिन बीते करीब छह साल पहले अपनी चाची के साथ बने रिश्ते वो अब भी निभा रहा है।

सांगली में स्वास्थ्य और मानवाधिकार पर काम करने वाले “संग्राम” नाम के एनजीओ की संगीता आनंद भिंगारदेवे का कहना है, ‘ऐसे हालात में परिवार ये सोचता है कि घर के किसी सदस्य से महिला के सेक्स संबंध हैं, तो ये ठीक है। घर की बात घर में ही रहेगी। अगर बच्चे भी हुए, तो उनके शरीर में परिवार का ही रक्त बहेगा।’

विछोह के राग
गांवों से पुरुषों के शहर चले जाने का मतलब ये होता है कि महिला को ही परिवार और घर के काम को देखना होता है। ऐसे में उनके लिए इच्छा और जुड़ने का जरिया सिनेमा और लोकगीत होते हैं। मशहूर फिल्मकार मुजफ्फर अली की 1978 की फिल्म ‘गमन’ का डायलॉग है, ‘आपकी याद आती रही रातभर।’ ये डायलॉग बिछुड़े हुए दंपति की इच्छा को दिखाता है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक लोकगीत है, ‘सेर गेहुंवा बरस दिन खैबा, बरस दिन खैबा, पिया के जाए न दिबाइन हो, राखिबे अखियां के हजुरवां, पिया के जाए ने देबाइन हो’ यानी एक सेर गेहूं मैं साल भर खाऊंगी, लेकिन अपने पति को जाने नहीं दूंगी। मैं उसे हमेशा अपनी आंखों के सामने रखूंगी और उसे जाने नहीं दूंगी।

जब पति घर से दूर हो, तो भाभी के विरह की बात तमाम लोकगीतों में है। खासकर ऐसे गीतों में भाभी की दिक्कत को देवर बताता है। साल 2002 में प्रकाशित एक स्टडी में दिल्ली यूनिवर्सिटी की इतिहासवेत्ता चारू गुप्ता ने लिखा कि ऐसा क्यों है कि देवर में नई ब्याही युवती अपना साथी तलाशती है। इसकी वजह ये है कि परिवार में देवर ही होता है, जिससे वो काफी खुलकर बात कर सकती है और देवर उसका करीबी होता है।

शोध से ये भी पता चला है कि गांवों की जिंदगी में सेक्स को लेकर सीमाएं और उसकी परिभाषा काफी खुलापन लिए होती हैं। वडोदरा की महिलाओं के बारे में एक्टिविस्ट माया शर्मा ने पाया कि एक गांव में दो महिलाएं साथ रहती थीं। गांव के लोग उन्हें मियां-बीवी की जोड़ी कहते थे।

माया शर्मा कहती हैं, ‘अपनी इच्छा जताने के कई अन्य और अनोखे तरीके हैं।’ उन्होंने गुजरात और यूपी में कई मामलों में ऐसा पाया है। माया कहती हैं,‘वो चुप रहकर भी साथ रहकर अपनी भावनाएं जाहिर करती हैं। इसके लिए वो सामाजिक मान्यताओं को दरकिनार भी नहीं करतीं। मैं ये भी नहीं कहती कि गांववालों को पता नहीं होता कि दोनों महिलाओं के बीच आखिर हो क्या रहा है।’

शहरी इलाकों में प्रगाढ़ दोस्ती वाली दो महिलाओं को लेस्बियन कहा जाता हैं। गांवों में इसी तरह की दोस्ती को ‘पक्की सहेलियां’ का दर्जा दिया जाता है। कई ऐसे उदाहरण हैं, जब दो महिलाएं साथ रहती हैं। इनमें से कई चुपचाप बताती हैं कि उनका अपनी सहेली से जिस्मानी रिश्ता है। गांवों में इस तरह के रिश्ते या तो लोग अनदेखा कर देते हैं या इस तरह का रिश्ता रखने वालों को माफ कर देते हैं। ऐसे भी मामले हैं, जहां कई लोगों को पता चल गया या दोनों लोगों ने रिश्ते बनाने में समाज के कायदे ताक पर रख दिए। ऐसे में उन्हें ऐसी सख्त सजा मिली, जैसी शायद शहरों में किसी को नहीं मिलती। सजा में महिला को निर्वस्त्र घुमाने और गांव से निकाल बाहर करने जैसा भी होता है।

सांगली के कोकरू गांव के बाहर छह औरतें बैठी हैं। वो सात महीने पहले हुई एक घटना के बारे में बताती हैं। रत्नागिरी जिले के इस्लामपुर गांव में किस तरह एक एक महिला को बाहर कर दिया गया था। उस महिला के पति की मौत हो चुकी थी। कोकरूद में सिलाई का काम करने वाली एक महिला कहती है,‘उसकी गलती को गांव के लोग मान नहीं सके। खासतौर से परिवार के मर्द। उसका पति कई साल पहले मर चुका था। जब महिला का पेट बाहर निकलना शुरू हुआ, तो उससे पूछताछ होने लगी। शुरू में उसने बताया कि पेट में गांठ बन गई है, लेकिन बाद में घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। सेक्स संबंध छिपाने के लिए अपने पैदा हुए नवजात को उसने एक आश्रम को दे दिया। फिर भी गांव के लोगों को पता चल गया। जब देवर को बात पता चली, तो उसने पंचायत बुलवाई। पंचायत ने महिला को 20 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुना दी, लेकिन यही काफी नहीं था। महिला के देवर ने पंचायत से मांग की कि उसकी भाभी को गांव से बाहर कर दिया जाए। अब ये महिला पास के गांव में अपने रिश्तेदार के साथ रहती है। जबकि, उसकी नाबालिग बच्चियां ससुराल में रहती हैं।’

इच्छा की सामाजिक ऊंच-नीच
भारत के समाजों में ऊंच-नीच यानी परिवार में बड़े और छोटे के बीच अंतर को माना जाता है। ऐसे में महिलाओं की ओर से सेक्स की इच्छा को भी उसकी जाति, धर्म और सामाजिक हैसियत के तराजू में तौला जाता है। दलितों से संबंधित कई साहित्य में इस बारे में काफी लिखा गया है कि कैसे सदियों से अगड़ी जाति के लोग दलित महिलाओं से सेक्स को अधिकार समझते रहे हैं। उन महिलाओं से सेक्स की भूख मिटाने की अगड़ी जातियों की इच्छा रहती है, जो उनके यहां काम करती हैं या उनके परिवार को इन अगड़ी जातियों के घरों और खेतों में नौकरी करनी होती है। फिर भी ऐसी महिलाओं में से कुछ के ही संबंधों को अगड़ी जातियों से मंजूरी मिलती है। उदाहरण के तौर पर अगड़ी जाति का कोई पुरुष किसी दलित महिला से संबंध तो रख सकता है, लेकिन अविवाहित अगड़ी जाति का पुरुष ऐसा नहीं कर सकता। वजह ये है कि वो शायद दलित महिला को अपनी जीवन संगिनी बना लेगा।

1987 में केतन मेहता ने ‘मिर्च मसाला’ नाम से फिल्म बनाई थी। जिसमें स्मिता पाटील और नसीरुद्दीन शाह ने गजब की एक्टिंग की थी। फिल्म में एक अगड़ी जाति का व्यक्ति, निचली जाति की महिला में सेक्स की इच्छा पूरी करने का तरीका खोजता है। फिल्म में दिखाया गया था कि गांव की महिलाएं किस खुलेपन से विवाहेत्तर सेक्स के बारे में बात करती हैं। पूरी फिल्म में शादीशुदा सोनबाई (स्मिता पाटील) सेक्स को लेकर अपनी स्वायत्तता को एक ताकतवर पुरुष की सेक्स की मांग के आगे समर्पित करने से इनकार कर देती है। वो भी उस वक्त, जबकि गांव की अन्य महिलाएं इस ताकतवर पुरुष से गांव को नुकसान की आशंका देखते हुए सोनबाई को उससे संबंध बनाने के लिए कहती रहती हैं।

फिर भी एक अचरज है, कि गांवों में अगड़ी जाति की महिलाओं के मुकाबले नीची जाति की महिलाओं में सेक्स को लेकर इच्छा और उसे पूरा करने के तरीके ज्यादा जोरदार होते हैं। दलित महिलाओं को हालात और उनका काम ज्यादातर समय मर्दों के पास रहने को मजबूर करता है और इसी वजह से उनके बीच शारीरिक या दूसरे तरह के संबंधों के मामले ज्यादा होते हैं। निरंतर एनजीओ की वरिष्ठ फैलो पूर्णिमा गुप्ता कहती हैं, ‘दलित महिला होने के नाते, अगड़ी जाति की महिलाओं की तरह उनकी सेक्स की इच्छा पर कोई पाबंदी नहीं होती। आप गांवों में देखेंगे कि अगड़ी जाति की महिलाएं घूंघट करती हैं। आप जब उनसे बात करते हैं, तो पति या परिवार के पुरुष सदस्य हमेशा साथ रहते हैं। यानी जाति भी ये तय करती है कि महिला को सेक्स के संबंध में कितनी आजादी है। अगड़ी जाति के लोग महिला की सेक्स पर कंट्रोल रखते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों में उन्हीं के जीन्स हों।’

गंदी बातें
भूख और सेक्स की इच्छा सार्वभौमिक है और सदा से चली आ रही है। शायद इसी वजह से संस्कृतियों में सेक्स और भूख को आपस में जोड़ा जाता रहा है। इस मामले में भारत के गांवों में भी हालात वैसे ही हैं। बुंदेलखंड के बांदा जिले में मई से जुलाई और जनवरी-फरवरी में शादी-ब्याह होते हैं। भले ही ये दुल्हन और दूल्हे के लिए बड़ा दिन हो, लेकिन गांव की महिलाओं को शादी समारोह में पुरुषों के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने का खूब मौका मिलता है।

शादी के दिन एक टेंट लगता है और यहां महिलाएं इकट्ठा होकर बहलौल करती हैं। बारात लेकर दूल्हे के लड़की के घर जाने के बाद उसके घर में बहलौल होता है। इसमें दो महिलाएं पीठ से पीठ सटाकर बैठती हैं। दूसरी महिलाएं उनके स्तनों और शरीर के बाकी हिस्सों को छूती हैं। कभी बेलन को लिंग की तरह दिखाती हुईं उम्रदराज महिला एक कम उम्र की युवती से पति की तरह पेश आती है। वो गाती हैं, ‘तंबुआ तान तने गोरी, तंबुआ तान तने गोरी’। करीब एक घंटे तक बहलौल होता है और इसमें यौनांग के पास के बाल से लेकर सुहागरात में हुए सेक्स के बारे में भी बात होती है।

हरियाणा में लैंगिकता पर शोध करने वाले और ‘कंटेनशस मैरेजेस, इलोपिंग कपल: जेंडर, कास्ट एंड पैट्रियार्की इन नॉर्दर्न इंडिया’ लिखने वाले प्रेम चौधरी कहते हैं, ‘महिलाएं जो गीत गाती हैं, उससे साफ होता है कि ग्रामीण इलाकों में सेक्स को लेकर कितना खुलापन है। कुछ साल पहले पुरुष ऐसे गीतों पर रोक लगाने के लिए खाप पंचायत तक गए। क्योंकि महिलाएं अपने गीतों में नीची जाति के पुरुषों को पति के तौर पर बताती हैं। इससे अगड़ी जाति के पुरुषों को बुरा लगता है कि उन्हें महिलाएं कमतर समझ रही हैं।’

20वीं सदी तक सेक्स को लेकर फिक्शन, करीब-करीब पॉर्नोग्राफी जैसी सेक्स की किताबें हिंदी में आ गई थीं। यूपी के ब्रज इलाके के लोकगीत और कविताएं भी लोग गुनगुनाने लगे थे। आज भी यूपी में हर जगह सेक्स पर किताबें, सेक्स की मुद्रा वाले ताश के पत्ते और बायस्कोप में ताजमहल और कुतुब मीनार की तस्वीरों के बीच में सेक्स करते महिला-पुरुष की तस्वीरें आम हैं। महिलाएं हालांकि इनसे दूर ही रहती रही हैं, लेकिन मोबाइल फोन ने उनके लिए काम आसान कर दिया है। वो पॉर्न फिल्मों को डाउनलोड कर देख लेती हैं। जबकि पुरुष किसी दुकान से ऐसी फिल्मों की डीवीडी किराए पर ले आते हैं।

सेक्स एजुकेशन न मिलने की वजह से सेक्स को लेकर इच्छाएं दमित रूप ले रही हैं। मिंट के संवाददाता को तमाम औरतों ने बताया कि शादी के बाद उनके पति ने उन्हें पॉर्न फिल्म दिखाकर सेक्स करने के तरीके बताने की कोशिश की। ये महिलाएं देसी यानी भारतीय पॉर्न फिल्में देखना पसंद करती हैं, क्योंकि वो इसे खुद के करीब पाती हैं और उनसे आसानी से सीख सकती हैं। यूपी और मध्यप्रदेश की सीमा पर एक गांव में 30 साल की महिला रहती है। वो कहती है कि युवतियों को पता ही नहीं होता कि सेक्स में उन्हें क्या चाहिए। इस महिला की शादी 17 साल की उम्र में हुई थी और सात साल बाद उसका तलाक हो गया। महिला के मुताबिक पति बिना उसकी मर्जी के सेक्स करता था और उसके शरीर के बारे में भी उसे जानकारी नहीं थी। दूसरी शादी करने के बाद इस महिला की सेक्स को लेकर मनचाही जरूरत पूरी हो रही है। वो कहती है, ‘जब दो लोग बिस्तर पर होते हैं, तो मुझे कोई चीज अजीब नहीं लगती। हर किसी को अपने तरीके से मजे लेना आता है। दुर्भाग्य से जब सेक्स की बात होती है, तो महिलाओं को ज्यादातर वक्त निराश होना पड़ता है। पुरुष आता है, वो सेक्स करता है और चला जाता है, लेकिन अगर हमें पता हो कि हमारा जिस्म क्या चाहता है, तो हम पुरुष से उसे मांग सकते हैं।’

सांगली जिले के मांगले गांव में 34 साल की एक महिला मिली। जिसने बेलन जैसी किनारों से मोटी चीज से अपनी सेक्स की भूख शांत की। जबकि, तमाम महिलाएं सेक्स की भूख मिटाने के लिए इस जैसी चीज की जगह पुरुषों का साथ पसंद करती दिखीं। एनजीओ निरंतर ने एक स्टडी की। जिसमें देखा गया कि कौमार्य हासिल करने वाली लड़कियों के सेक्स संबंधी तमाम सपने होते हैं। एक लड़की ने बताया कि वो सिर्फ अंडरगारमेंट पहनकर बंदूक से गोली चलाना चाहती है। कुछ लड़कियां बाल कटाकर पुरुष दोस्तों के साथ हाथ में हाथ डालकर घूमना चाहती थीं।

एक महिला ऐसी भी मिली, जानवरों का दूध दुहकर जिसके हाथों में दर्द होने लगता है। कई बार खेत से घर तक का रास्ता भी उसे लंबा और अकेलापन देता है। इस महिला की जाति ये मंजूरी नहीं देती कि पति की मौत होने पर वो दूसरी शादी कर ले, लेकिन उसके लिए सेक्स की इच्छा को पूरा करने के लिए समाज की मंजूरी की जरूरत नहीं है। उसका कहना है कि अगर वो यही सोचती रहे कि लोग क्या कहेंगे, तो उसके बारे में भला कौन सोच रहा होगा। पहली बार सेक्स करने के 20 साल बाद अब ये महिला ये मानती है कि पुरुषों का ही बिस्तर पर एकाधिकार नहीं है।

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