अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तय करेगी महिलाओं का खतना वैधानिक है या नहीं

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नई दिल्ली। दाऊदी बोहरा समुदाय की नाबालिग लड़कियों के खतना के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को 5  जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया है। तीन जजों की पीठ ने कहा कि अब 5 जजों की संविधान पीठ तय करेगी कि क्या समुदाय में महिलाओं का खतना संवैधानिक है ? याचिका में भारत में खतना प्रथा पर पूरी तरह से रोक लगाने की मांग की गई है। 

क्‍या कहा गया है याचिका में

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कहा गया है कि खतना को संज्ञेय और गैरजमानती धारा के तहत अपराध माना जाए। याचिकाक्रर्ता ने कहा है कि किसी के प्राइवेट पार्ट को छूना पॉस्को के तहत अपराध है। वहीं मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए क्योंकि मामला संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है।

सरकार भी बैन के समर्थन में

केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि धर्म की आड़ में लड़कियों का खतना करना जुर्म है और वह इस पर रोक का समर्थन करता है। इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से कहा जा चुका है कि इसके लिए 7 साल तक कैद की सजा का प्रावधान भी है। उधर, दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश मुकुल रोहतगी ने कहा कि ये गंभीर मामला है। सुप्रीम कोर्ट को इसकी सुनवाई करनी चाहिए।

पिछली सुनवाई पर क्‍या कहा था कोर्ट ने

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी – ‘किसी भी धर्म के नाम पर कोई भी किसी लड़की के यौन अंग को कैसे छू सकता है ? यौन अंगों से छेड़छाड़ लड़कियों की गरिमा और उनके सम्मान के खिलाफ है।’ पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि खतना से जो बच्चों को नुकसान पहुंचता है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती। दुनिया के 42 देश खतना को प्रतिबंधित कर चुके हैं। इनकी आस्था ख़तने में हो सकती है लेकिन इन्हें संविधान के तहत ही प्रक्रिया को अपनाना होगा। ये प्रथा संवैधानिक प्रावधानों का उल्‍लंघन है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि सती और देवदासी की तरह ख़तना प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए।

क्‍या कहता है दाऊदी बोहरा समाज

दाऊदी बोहरा मुस्लिम संगठनों के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, ‘प्रक्रिया उतनी क्रूर नहीं है, जैसा याचिकाकर्ता बता रहे हैं। यह प्रथा सदियों से चलन में है। ये बोहरा समुदाय का अनिवार्य धार्मिक नियम है, इस मामले पर विस्तृत सुनवाई ज़रूरी है। बोहरा समुदाय की तरफ से कहा गया कि वो कोशिश करेंगे कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए डॉक्टर की सहायता लें। उन्‍होंने कहा, ‘हम चाहते हैं कि अदालत इस बात को रिकॉर्ड पर ले कि भविष्य में हम इसे प्रशिक्षित डॉक्टर से ही कराएंगे। इसे वैक्सिनेशन या मुंडन की तरह प्रथा ही समझा जाए।’

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