60 साल का हुआ NASA, अबतक हासिल की हैं ये बड़ी उपलब्धियां

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नई दिल्ली। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने अपनी स्थापना के 60 वर्ष पूरे होने पर एक लोगो जारी किया है। NASA (नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) की स्थापना भारत की आजादी के करीब 11 वर्ष बाद 29 जुलाई, 1958 को हुई थी। आइए जानते हैं इन 60 सालों में कैसा रहा NASA का सफर –

सोवियत संघ ने 1957 में अपना सैटेलाइट ‘स्पूतनिक’ अंतरिक्ष में भेजा, जिससे अंतरिक्ष में सोवियत संघ का दबदबा होने की आशंकाए पैदा होने लगीं। इसके अगले ही साल जनवरी, 1958 में अमेरिका ने जवाबी कदम उठाते हुए ‘एक्सप्लोरर वन सैटेलाइट’ अंतरिक्ष में रवाना किया। इसके लगभग 6 महीने बाद अमेरिकी कांग्रेस ने नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी NASA के गठन को मंजूरी दी। तभी से इसने अंतरिक्ष में शोध की दुनिया में धूम मचा रखी है।

नासा ने अपनी स्थापना के सिर्फ 11 साल बाद इंसान को चांद की धरती पर उतारने में कामयाबी हासिल की। 20 जुलाई, 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग और एडविन एल्ड्रिन ने पहली बार चांद पर कदम रखा और वहां अमेरिकी झंडा गाड़ा।

14 अप्रैल, 1970 को अंतरिक्ष यान ‘अपोलो 13’ का एक ऑक्सीजन टैंक फट गया, जिसके बाद अंतरिक्ष यात्री जेम्स लोवेल (बीच में) ने टेक्‍सास में नासा के बेस को खबर दी – ‘ह्यूस्‍टन यहां समस्‍या हो गई है।’ जोखिम भरे रिपेयरिंग ऑपरेशन के बाद चालक दल अपोलो 13 को वापस जमीन पर लाया। इस पूरी घटना पर 1995 में ‘अपोलो 13’ नाम से एक फिल्म भी बनी, जिसके कारण लोवेल का कहा वाक्य बहुत मशहूर हुआ।

‘चैलेंजर’ स्पेस शटल ‘अपोलो 13’ की तरह भाग्यशाली नहीं रहा। 28 जनवरी, 1986 को उड़ान भरने के चंद मिनटों के भीतर इसमें धमाका हुआ और उस पर सवार सभी 7 लोग मारे गए। इस क्रैश की वजह एक रबर सील रिंग थी, जो ठंडे तापमान में काम नहीं कर सकी।

रूसी और अमेरिकी वैज्ञानिकों के बीच शीत युद्ध 14 दिसंबर, 1998 को खत्म हुआ। तब अंतरिक्ष में अमेरिका निर्मित ‘यूनिटी मॉड्यूल’ और रूस निर्मित ‘जारिया मॉड्यूल’ एक-दूसरे से मिले। इसी के बाद अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की बुनियाद पड़ी।

भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की मौत भी नासा के दर्दनाक अनुभवों में शामिल है। फरवरी] 2003 में पृथ्वी पर लौटते हुए अंतरिक्ष यान ‘कोलंबिया’ टुकड़े टुकड़े हो गया और उस सवार कल्पना समेत सभी 7 लोग मारे गए।

नासा ने 6 अगस्त, 2012 को मंगल ग्रह पर अपने ‘क्यूरोसिटी रोवर’ को उतारा। यह मोबाइल लेबोरेट्री अब भी लाल ग्रह से वैज्ञानिक खोजों से जुड़ी जानकारी भेज रही है। इतना ही नहीं, ‘क्यूरोसिटी रोवर’ कभी-कभी सेल्फी भी भेजता है और ट्वीट भी करता है।

क्यूरोसिटी जो डाटा भेज रहा है, वह नासा के अगले मिशन के लिए बहुत अहम है और यह मिशन मंगल ग्रह पर इंसानों को उतारने का है। अभी के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2030 के दशक में ऐसा संभव हो सकता है।

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