एक देश ऐसा, जहां लड़कियों को सैनिटरी पैड के बदले टैक्‍सी ड्राइवरों से बनाना पड़ता है संबंध

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नई दिल्‍ली। पीरियड्स या माहवारी एक बेहद ही स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है,लेकिन इसे लेकर आज भी लोगों में जागरूकता की कमी है। गांवों या पिछड़े इलाकों में तो लड़कियों या महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियां हैं। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों में भी इसे लेकर कई तरह की रूढि़यां हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि अफ्रीकन महाद्वीप में स्थित केन्या में तो लड़कियों को सैनिटरी पैड के बदले अपना शरीर बेचना पड़ता है।  

यूनिसेफ की रिसर्च में खुलासा

यूनिसेफ की एक खास रिसर्च में बहुत ही डराने वाली सच्‍चाई सामने आई है। रिसर्च में खुलासा हुआ है कि केन्या की राजधानी नैरोबी के किबेरा स्‍लम में रहने वाली करीब 65 फीसदी महिलाओं ने सिर्फ एक सैनिटरी पैड के बदले मजबूरी में अपने शरीर का सौदा किया। बता दें कि किबेरा अफ्रीका का सबसे बड़ा स्‍लम एरिया है। वहीं पश्चिमी केन्‍या में करीब 10 फीसदी लड़कियां ऐसी हैं, जिन्‍होंने सैनिटरी पैड के लिए अपने शरीर का सौदा किया। यहां आज भी पीरियड्स को लेकर लोग खुलकर बात नहीं करते हैं, यह उनके लिए शर्म की बात है।

टैक्‍सी ड्राइवर लेकर आते हैं पैड्स

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केन्या में यूनिसेफ के मुख्य अधिकारी एंड्रयू ट्रेवेट का कहना है कि, यहां पर गरीबी बहुत ज्यादा है। ऐसे में सैनेटरी पैड्स के बदले टैक्सी ड्राइवर के साथ संबंध बनाना यहां की लड़कियों के लिए कोई नई बात नहीं है। ट्रेवेट बताते हैं कि यहां मोटरसाइकिल टैक्‍सी को बोडा बोडास कहा जाता है। लड़कियां सैनिटरी पैड के बदले इनके ड्राइवरों के साथ सेक्‍स करने को मजबूर होती हैं। ये टैक्‍सी ड्राइवर अपने साथ सैनिटरी पैड्स लेकर घूमते हैं।

क्‍या है कारण ?

ट्रेवेट बताते हैं कि इसके दो प्रमुख कारण हैं। एक बड़ा कारण तो यहां की गरीबी है। महिलाओं और लड़कियों के पास सैनिटरी पैड खरीदने के लिए पैसे ही नहीं होते। दूसरी वजह यह है कि यहां हाइजीन प्रोडक्ट्स हर जगह नहीं मिलते हैं। उन्‍हें खरीदने के लिए शहर तक जाना पड़ता है। लड़कियों के सामने एक तो ट्रांसपोर्ट की समस्‍या है, दूसरे उनके पास इतना पैसा नहीं कि वे बस का किराया देकर शहर जा सकें। कई इलाके तो ऐसे हैं, जहां न सड़क है और न आवागमन के साधन। ऐसे में टैक्‍सी ड्राइवरों से पैड्स लेना यहां की लड़कियों की मजबूरी बन जाता है, जिसके बदले में वे उनसे सेक्‍स की मांग करते हैं।

और क्‍या कहा गया है रिसर्च में ?

यूनिसेफ की रिसर्च में यह भी बताया गया है कि करीब 7 फीसदी महिलाएं और लड़कियां पीरियड्स के दौरान पुराने गंदे कपड़े, कंबलों के टुकड़े, मुर्गियों के पंख और अखबार आदि का इस्‍तेमाल करती हैं। रिसर्च के अनुसार, केन्या में 54 फीसदी लड़कियां को पीरियड्स के दौरान बेसिक हाइजीन की सुविधा भी उपलब्ध नहीं हैं। दूर-दराज के गांवों में तो सैनेटरी पैड्स के बारे में लोग सोचते तक नहीं है। ट्रेवेट कहते हैं, यहां लड़कियों में माहवारी को लेकर इतनी झिझक दिखाई देती है, जिससे लगता है कि लड़कियों को इसके बारे में जानकारी ही नहीं है। ना तो मां ही घर में उन्‍हें इसके बारे में बताती है और ना ही उन्‍हें स्‍कूल में इसके लिए जागरूक किया जाता है।

भारत में क्‍या है स्थिति

भारत के ज्यादातर हिस्सों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं पर लगाई जाने वाली सामाजिक पाबंदियों और उनसे अछूतों जैसे व्यवहार की वजह से हर महीने तीन-चार दिनों का यह समय किसी सजा से कम नहीं होता है। बहुत ज्‍यादा एडवांस परिवारों की बात छोड़ दें तो माहवारी के दौरान महिलाएं न तो खाना पका सकती हैं और न ही दूसरे का खाना या पानी छू सकती हैं। उनको किचेन में जाने तक की मनाही होती है। इस दौरान उन्‍हें मंदिर और पूजा-पाठ से भी दूर रखा जाता है। कई इलाकों में तो उनको जमीन पर सोने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके पीछे आम धारणा यह है कि इस दौरान महिलाएं अशुद्ध होती हैं और उनके छूते ही कोई चीज अशुद्ध या खराब हो सकती है। हालांकि जानकारों का कहना है कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बस परंपरा के नाम पर अब भी यह सब चला आ रहा है। वैसे संयुक्‍त परिवारों के धीरे-धीरे खत्‍म होने और महिलाओं के कामकाजी होने की वजह से अब कई इलाकों में हालात में बदलाव आ रहा है।

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