स्टडी में दावा : हवा में PM 2.5 की अधिक मात्रा बढ़ा रही मधुमेह रोगियों की संख्या

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नई दिल्‍ली। वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य पर कितना गंभीर दुष्प्रभाव डालता है, यह आज किसी से छिपा नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में होने वाली कुल मौतों में से लगभग एक चौथाई वायु प्रदूषण के कारण ही होती हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद 2.5 माइक्रॉन से कम आकार के महीन कण या पीएम-2.5 के संपर्क में आने से ये मौतें होती हैं। हाल ही में लेंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित अमेरिकी विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में पता चला है कि पीएम-2.5 मधुमेह की बीमारी को भी बुलावा देता है।

क्‍या कहा गया है शोध में ?

अमेरिका में किए गए पीएम 2.5 से मधुमेह को जोड़ने वाले इस नए शोध में 17 लाख अमेरिकी लोगों पर अध्ययन किया गया। ये सभी लोग पिछले साढ़े 8 साल से मधुमेह से ग्रस्त थे, जबकि उनका मधुमेह संबंधी कोई भी पूर्व इतिहास नहीं था। इन लोगों को ऐसी हवा में रखा गया गया, जहां प्रारंभिक और द्वितीयक स्तर पर पीएम 2.5 की मात्रा 5 से 22 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच थी। अध्‍ययन में पाया गया कि हवा में पीएम 2.5 जब 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर को पार करने लगता है तब मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है और 22 माइक्रोग्राम पर वह स्थिर हो जाता है। इससे निष्‍कर्ष निकाला गया कि जबतक हवा में पीएम 2.5 का स्तर 10 माइक्रोग्राम तक रहता है, तबतक मधुमेह का खतरा नहीं है।

कैसे होता है मधुमेह ?

विकासशील देशों में वायु प्रदूषण न केवल मृत्यु का एक प्रमुख कारण है, बल्कि हृदय और सांस संबंधी रोगों के साथ-साथ डिमेंशिया जैसी विकृतियों के लिए जिम्मेदार माना जाता है। अब चूहों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि पीएम 2.5 पतली कोशिका झिल्लियों से होकर नाक से मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि पीएम 2.5 रक्त प्रवाह में मिलकर लिवर को क्षति पहुंचा सकता है, जिससे मधुमेह होने का खतरा बढ़ता है। शोध में अब यह बात पता चल गई है कि वायु प्रदूषण ऑक्सीकारक तनाव पैदा कर सकता है। इसका मतलब है कि यह शरीर की प्रदूषण से लड़ने की क्षमता को कम कर सकता है और कोशिकीय संरचना और डीएनए को भी नुकसान पहुंचा सकता है। पीएम 2.5 जैसे छोटे प्रदूषकों से तो और अधिक ऑक्सीकारक तनाव पैदा होता है।

अनदेखी खतरनाक

वर्ष 2016 में पीएम 2.5 के कारण हुईं मौतों की संख्या लगभग 6 लाख थी। हालांकि, यह मधुमेह ग्रसित लोगों की कुल संख्या की तुलना में काफी कम लगती है, लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि उसी वर्ष भारत में मधुमेह के कारण होने वाली अक्षमताओं (disabilities) से 16 लाख से अधिक लोग पीड़ित पाए गए थे। इसमें असामयिक मौतों की संख्या लगभग 7 लाख थी, जबकि अक्षमता के कारण 9 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। ऐसे में कह सकते हैं कि पीएम 2.5 के दुष्‍प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

भारत में 7.2 करोड़ लोग डायबिटिक

भारत में वर्ष 2017 में मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या 7.2 करोड़ आंकी गई थी, जो विश्व के कुल मधुमेह रोगियों के लगभग आधे के बराबर है। यह संख्या वर्ष 2025 तक दोगुनी होने का अनुमान है। पंजाब, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे प्रति व्यक्ति उच्‍च आय वाले राज्यों में मधुमेह रोगियों की संख्या अधिक है। जीवनशैली और भोजन संबंधी आदतों में बदलाव के कारण शहरी गरीबों में भी मधुमेह के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। 25 वर्ष से कम आयु के चार भारतीयों में से एक में शुरुआती मधुमेह पाया गया है। बता दें कि भारत में मधुमेह के इलाज की अनुमानित सालाना लागत 15 अरब डॉलर से अधिक है।

भारत के लिए चिंता की बात

पीएम 2.5 और मधुमेह के बीच इस तरह के संबंध के आधार पर किए गए अध्ययन ने भारत के लिए चिंतनीय स्थिति पैदा कर दी है। पिछले दिनों दिल्ली और कानपुर में जब वायु की गुणवत्‍ता मापी गई तो यहां पीएम 2.5  का स्तर क्रमश: 143 और 173 माइक्रोग्राम मिला। आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं कि यह स्थिति कितनी खतरनाक है। इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रदूषित हवा में कम समय रहने वाले की अपेक्षा अधिक समय रहने वाले के शरीर पर इसके अत्यधिक भयावह परिणाम देखने को मिल सकते हैं। मोटापे से लड़ रहे लोगों के लिए यह निष्कर्ष और डरावने हो सकते हैं। हवा में प्रदूषण की बढ़ती मात्रा और स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए वायु प्रदूषण को कम करने के लिए व्यापक कदम उठाने की आवश्यकता है।

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