रिपोर्ट में खुलासा : जनजातीय इलाकों में भी बढ़ीं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां

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नई दिल्‍ली। अभी तक यह माना जाता था कि जनजातीय इलाकों में रहने वाले लोग सिर्फ कुपोषण और मलेरिया जैसी कुछ संचारी बीमारियों से ही ग्रस्‍त होते हैं और उनमें जीवनशैली से जुड़ी ना के बराबर होती हैं। अब हाल ही में किए गए एक अध्‍ययन में सामने आया है कि हाई ब्‍लडप्रेशर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी जीवनशैली से संबंधित बीमारियों ने भी इन क्षेत्रों में दस्‍तक दे दी है। यही नहीं, इन लोगों में अब मानसिक बीमारियां भी घर कर रही हैं।

किसने तैयार की रिपोर्ट ?  

वर्ष 2013 में स्वास्थ्य मंत्रालय और जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। पिछले दिनों इस समिति के अध्यक्ष और ग्रामीण स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. अभय बंग ने यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। इसी रिपोर्ट में ये तथ्य सामने आए हैं।

क्‍या कहा गया है रिपोर्ट में ?

सामान्‍यत: माना जाता है कि प्रकृति की गोद में रहने तथा स्वस्थ खानपान की वजह से जनजातीय आबादी जीवन शैली से जुड़े रोगों की चपेट में नहीं आती है, लेकिन  इस रिपोर्ट ने इस धारणा को झुठला दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जनजातीय समुदाय वर्तमान में तीन तरफा समस्‍याओं से जूझ रहा है। इनमें संक्रामक रोग (मलेरिया, तपेदिक, कुष्ठ रोग आदि), गैर-संक्रामक रोग (मधुमेह, हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप) और  मानसिक तनाव तथा सेहत से जुड़ी अन्य समस्याएं शामिल हैं।

मलेरिया के सबसे अधिक मामले

बता दें कि जनजातीय समुदाय के लोग पहले से ही मलेरिया और कुपोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। भारत की कुल आबादी में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी करीब 8.6 प्रतिशत है। आपको जानकर अचरज होगा कि मलेरिया के कुल मामलों में से 30 प्रतिशत मामले जनजातीय क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं और इसके कारण होने वाली कुल मौतों में 50 प्रतिशत मौतें इन्‍हीं इलाकों में होती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2030 तक देश में मलेरिया उन्मूलन का लक्ष्य तभी पूरा किया जा सकता है, जब आदिवासी स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए।

हृदय रोगों का प्रसार बढ़ा

रिपोर्ट के अनुसार, जनजातीय बहुल 10 में से 7 राज्यों में हृदय रोगों का प्रसार गैर जनजातीय आबादी के बराबर है, जबकि महाराष्ट्र और अंडमान निकोबार द्वीप की जनजातीय आबादी में आम जनसंख्या की अपेक्षा हृदय रोगों का प्रसार अधिक है। वर्ष 2009 में राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो (NNMB) ने एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें पता चला कि प्रत्येक चार जनजातीय वयस्कों में से एक हाई ब्‍लडप्रेशर से पीड़ित है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय दर के बराबर है। मध्य प्रदेश में एनआईआरटीएच के सर्वेक्षण के अनुसार, बैगा जनजाति में उच्च रक्तचाप का प्रसार मंडला में 10.5 प्रतिशत, डिंडोरी में 20.2 प्रतिशत और बालाघाट में 11.2 प्रतिशत है। छिंदवाड़ा जिले की पातालकोट घाटी के भरिया जनजाति के 21.5 प्रतिशत लोग हाई ब्‍लडप्रेशर से ग्रस्त पाए गए हैं।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर भी असर

ज्‍यादातर जनजातीय इलाकों में नक्सल हिंसा जैसी समस्याएं भी हैं, यही कारण है कि यहां के निवासी तनाव और मानसिक बीमारियों की चपेट में भी आ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यावरणीय आपदाओं, खनन, भूमि अधिग्रहण और आजीविका के संकट के कारण हो रहे पलायन का असर जनजातीय लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

समिति ने क्‍या दिए सुझाव ?

विशेषज्ञ समिति का कहना है कि जनजातीय इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं काफी लचर हैं। यह चिंताजनक स्थिति है क्योंकि जनजातीय लोग पूरी तरह सार्वजनिक सेवाओं पर निर्भर हैं। पारंपरिक चिकित्सकों पर उनकी निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है, इसलिए यह जरूरी है कि सरकारी स्वास्थ्य तंत्र को जनजातीय क्षेत्रों में मजबूत किया जाए। समिति का यह भी मानना है कि पारंपरिक उपचार पद्धतियों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि जनजातीय चिकित्सा प्रणाली और आधुनिक प्रणाली में सामंजस्‍य बिठाया जा सके।

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