SC का बड़ा फैसला : दहेज उत्पीड़न में अब तुरंत हो सकेगी पति की गिरफ्तारी

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नई दिल्‍ली। दहेज उत्पीड़न के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (14 सितंबर) को एक बड़ा फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक पुराने फैसले में बदलाव करते हुए पति के परिवार को मिलने वाली सुरक्षा को खत्म कर दिया है। ताजा फैसले के अनुसार, आईपीसी की धारा 498A के तहत दहेज उत्पीड़न के मामले में अब पति को तुरंत गिरफ्तार किया जा सकेगा।

क्‍या कहा सुप्रीम कोर्ट ने ?

दहेज उत्पीड़न कानून (498 A) पर अपने फैसले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्‍यीय पीठ ने कहा कि अब शिकायत की सुनवाई के लिए किसी परिवार कल्याण कमेटी की आवश्यकता नहीं होगी। कोर्ट का कहना है कि पीड़ित महिला की सुरक्षा के लिए इस प्रकार का निर्णय काफी जरूरी है। हालांकि  कोर्ट ने कहा कि पति और उसके परिवारीजनों के पास अग्रिम ज़मानत लेने का विकल्‍प बरकरार रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज में महिला को बराबर हक मिलना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। साथ ही हम ऐसा भी निर्णय नहीं दे सकते हैं कि पुरुष पर किसी तरह का गलत असर पड़े।

अप्रैल में सुरक्षित रखा था फैसला

बता दें कि दहेज प्रताड़ना के मामले में सीधी गिरफ्तारी पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 23 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रख लिया था। पिछले साल जुलाई महीने में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने दहेज प्रताड़ना अधिनियम के दुरुपयोग के मद्देनजर कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे। इसके बाद  चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने  दहेज उत्पीड़न कानून का दुरुपयोग रोकने के मद्देनजर इस निर्णय का दोबारा परीक्षण करने का निर्णय लिया था। पीठ ने कहा था कि जब 498ए को लेकर आईपीसी में पहले से ही प्रावधान हैं, ऐसे में कोर्ट दिशानिर्देश कैसे बना सकता है?

पिछले फैसले में क्‍या कहा था कोर्ट ने ?

बता दें कि 28 जुलाई, 2017 को राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने कई दिशानिर्देश जारी किए थे। इनमें दहेज उत्पीड़न मामले में बिना जांच-पड़ताल के पति और ससुराल वालों की गिरफ्तारी पर रोक की बात कही गई थी। साथ ही पीठ ने हर जिले में कम से एक परिवार कल्याण समिति के गठन का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि 498ए की हर शिकायत को समिति के पास भेजा जाए और समिति की रिपोर्ट आने तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने इस काम में  सिविल सोसाइटी को भी शामिल करने का निर्देश दिया था।

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