शैवाल की ऐसी प्रजातियां मिलीं, जो जलवायु परिवर्तन की निगरानी में मददगार

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लखनऊ। अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में ऐसी शैवाल प्रजातियां मिली हैं, जिनका उपयोग जलवायु परिवर्तन की निगरानी के लिए किया जा सकता है। ऐसी 122 शैवाल प्रजातियों का पता लगाया है। इनमें से 16 शैवाल प्रजातियां ऐसी हैं जिनका उपयोग जलवायु परिवर्तन की निगरानी के लिए जैव-संकेतक के रूप में किया जा सकता है। भारतीय वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन में यह बात सामने आई है।

किसने किया अध्‍ययन ?

यह अध्‍ययन लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), अहमदाबाद के इसरो के अंतरिक्ष उपयोग केंद्र और ईटानगर के नॉर्थ ईस्टर्न रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस अध्‍ययन को शोध पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित किया गया है।

अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में निगरानी प्‍लॉट बनाने में जुटी शोधकर्ताओं की टीम

क्‍या कहना है शोधकर्ताओं का

शोधकर्ताओं के मुताबिक, जलवायु और पर्यावरण में होने वाले बदलावों के प्रति संवेदनशील होने के कारण विभिन्न शैवाल प्रजातियों को पारिस्थितिकी तंत्र के प्रभावी जैव-संकेतक के रूप में जाना जाता है। इस अध्ययन से जुड़े एक शोधकर्ता डॉ. राजेश बाजपेयी कहते हैं कि शोध से मिले आंकड़े पर्वतीय जैव विविधता के तुलनात्मक अध्ययन के लिए स्थापित वैश्विक कार्यक्रम ग्लोबल ऑब्जर्वेशन रिसर्च इनिशिएटिव इन अल्पाइन एन्वायर्न्मेंट्स (GLORIA) के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

कैसे करेंगे मदद ?

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता, NBRI के पूर्व उप-निदेशक डॉ डीके उप्रेती ने बताया, ‘किसी क्षेत्र विशेष में जीवित शैवाल समुदाय की संरचना से उस क्षेत्र की जलवायु स्थितियों के बारे में पता चल सकता है। शैवाल संरचना में बदलाव से वायु की गुणवत्ता, जलवायु और जैविक प्रक्रियाओं में परिवर्तन के बारे में पता लगाया जा सकता है।’ यही नहीं, शैवालों की निगरानी से पर्वतीय क्षेत्रों में हो रहे पर्यावरणीय बदलावों से संबंधित जानकारियां भी जुटाई जा सकती हैं और इससे संबंधित आंकड़ों का भविष्य के निगरानी कार्यक्रमों में भी उपयोग किया जा सकता है।

250 से अधिक नमूने किए इकट्ठा

वैज्ञानिकों ने तवांग की नागुला झील, पीटीएसओ झील एवं मंगलम गोम्पा के सर्वोच्च शिखर बिंदुओं पर विस्तृत सर्वेक्षण के बाद शैवाल के 250 से अधिक नमूने इकट्ठा किए हैं। इन निगरानी क्षेत्रों को शैवालों के वितरण और जैव विविधता के दीर्घकालिक अध्ययन के लिए क्रमशः 3000, 3500 और 4000 मीटर की ऊंचाई पर विकसित किया गया है। इनके अलावा तवांग मॉनेस्ट्री और सेला दर्रे के आसपास के इलाकों से भी नमूने जुटाए गए। शोधकर्ताओं ने पाया कि एकत्र नमूनों में 122 शैवाल प्रजातियां शामिल हैं।

इनके बारे में भी मिलेगी जानकारी

डॉ. राजेश बाजपेयी ने बताया कि  जैव-संकेतक शैवाल उथल-पुथल रहित वनों, हवा की गुणवत्ता, वनों की उम्र एवं उनकी निरंतरता, मृदा क्षरण रहित उपजाऊ भूमि, नए जंगलों, बेहतर पर्यावरणीय स्थितियों, पुराने वृक्षों वाले वनों, नम एवं शुष्क क्षेत्रों, प्रदूषण सहन करने की क्षमता, उच्च पराबैंगनी विकिरण क्षेत्रों और मिट्टी के पारिस्थितिकी तंत्र के बारे में जानकारी उपलब्ध कराने का जरिया बन सकते हैं। इस अध्ययन में डॉ. उप्रेती और डॉ. बाजपेयी के अलावा वर्तिका शुक्ला, सीपी सिंह, ओपी त्रिपाठी और एस नायक शामिल थे।

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