केंद्र सरकार में नौकरियों का टोटा, लेकिन सैलरी पर लगातार बढ़ रहा है खर्च

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नई दिल्ली। केंद्र सरकार में नौकरियों की कमी है। भर्तियां हो नहीं रही हैं, लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि कर्मचारियों की सैलरी पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। हालत ये है कि अभी करीब 1 लाख 80 हजार करोड़ से ज्यादा की रकम मोदी सरकार अपने कर्मचारियों को सैलरी देने में खर्च कर रही है।

लगातार बढ़ता रहा है सैलरी का खर्च

आंकड़ों के मुताबिक साल 2006-07 में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी पर करीब 40 हजार करोड़ रुपए खर्च होते थे। 2008-09 में सैलरी पर खर्च बढ़कर 62 हजार करोड़ रुपए हो गए। 2009-10 में ये खर्च बढ़कर 83 हजार करोड़ हो गया। 2011-12 में केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों पर सैलरी के मद में 87 हजार करोड़ रुपए खर्च करने लगी। 2012-13 में ये खर्च बढ़कर 1 लाख करोड़ से ज्यादा हो गया। 2014-15 में केंद्र सरकार के कर्मचारियों की सैलरी के मद में करीब 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। जबकि, 2016-17 से इस मद में 1 लाख 80 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं।

भरी नहीं जा रही हैं वैकेंसी

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2006-07 से लेकर 2016-17 तक खाली पदों की संख्या में तीन गुना इजाफा हुआ है और फिलहाल केंद्र सरकार में करीब 5 लाख पद खाली हैं। 2006 में खाली पदों की संख्या 4 लाख 17 हजार 495 थी। जबकि 2016 में खाली पदों की संख्या 4 लाख 12 हजार 752 हो गई। नागरिक उड्डयन मंत्रालय में करीब 49 फीसदी पद खाली हैं। जबकि, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय में करीब 44 फीसदी खाली पद हैं। बात करें रक्षा मंत्रालय की, तो 2016 में यहां सबसे ज्यादा 1 लाख 87 हजार 54 पद खाली थे। कुल मिलाकर 51 मंत्रालयों में औसतन 25 से 35 फीसदी स्टाफ कम हैं।

कम स्टाफ का सेवाओं पर गहरा असर

स्टाफ की कमी की वजह से सरकारी सेवाओं पर भी गहरा असर पड़ता है। 10 लोगों का काम जब एक आदमी करता है, तो उसका आउटपुट तो खराब रहता ही है, साथ ही उसे तनाव और अन्य दिक्कतें भी होती हैं। आम जनता को सरकार बेहतर व्यवस्था देने की बात करती है, लेकिन जब सरकारी कर्मचारियों की तादाद ही कम हो, तो सारे सरकारी वादे बेमानी रह जाते हैं। कर्मचारियों की कमी से बाकी स्टाफ को किस कदर परेशानी होती है, इसे यूं समझा जा सकता है कि दिल्ली में सफदरजंग हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने इसी साल जुलाई के महीने में ओपीडी में ज्यादा स्टाफ देने की मांग की थी। इसी तरह केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एक तिहाई स्टाफ की कमी से शिक्षण और रिसर्च की गुणवत्ता पर असर देखा गया है।

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