महंगी ब्रांडेड दवा होती है असरदार या सस्ती जेनेरिक ? यहां जानिए हकीकत

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नई दिल्ली। मोदी सरकार ने गरीबों तक महंगी दवाइयां पहुंचाने के इरादे से दवाइयों की कीमतें तो तय की ही हैं। साथ ही जेनेरिक दवाइयां बेचने वाले एक्सक्लूसिव स्टोर  भी देशभर में खुलवाए हैं। जो दवा बाजार में करीब 100 रुपए की होती है, वो इन स्टोर में महज 20 रुपए तक की कीमत में मिल जाती हैं, लेकिन सवाल ये उठता है कि ये सस्ती दवाइयां आखिर कितनी कारगर होती हैं। तो चलिए, इसकी पड़ताल कर लेते हैं।

अबू धाबी में भी सरकार दे रही बढ़ावा

अरब देशों को काफी समृद्ध माना जाता है। इन्हीं में अबू धाबी भी है। ये कच्चे तेल के अलावा प्राकृतिक गैस का सबसे बड़ा सप्लायर है। यानी पैसे की कोई कमी नहीं है और लोग भी यहां खूब कमाते हैं, लेकिन यूएई की सरकार ने लोगों को महंगी दवाइयों से निजात दिलाने के लिए जेनेरिक दवाइयों के स्टोर खोलने को बढ़ावा दिया है।

अमेरिका में भी जेनेरिक दवाइयों को बढ़ावा

दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में अमेरिका सबसे ऊपर है। यहां भी प्रति व्यक्ति आय काफी ज्यादा है, लेकिन इसके बावजूद अमेरिकी सरकार ने ऐसी व्यवस्था की है कि डॉक्टर अगर 10 तरह की दवा लिखते हैं, तो उनमें 9 दवाइयां सस्ती जेनरिक होती हैं।

किस तरह अलग होती हैं जेनरिक दवाइयां ?

ब्रांडेड यानी नामचीन कंपनियों में कई साल की रिसर्च के बाद कोई दवा बनती है। इस दवा को बनाने में करोड़ों डॉलर खर्च होते हैं। फिर उसकी मार्केटिंग और बेचने में भी इन कंपनियों का काफी पैसा खर्च होता है। ऐसे में दवा का पेटेंट जिस कंपनी के पास होता है, वो ही उसे बेचती है और इसके लिए कस्टमर से काफी पैसा लिया जाता है। 10-20 साल बाद जब पेटेंट खत्म हो जाता है, तो दूसरी कंपनियां भी वो दवा बना सकती हैं। इसे ही जेनेरिक दवा कहते हैं। जब बड़ी कंपनी का इस दवा पर से एकाधिकार खत्म हो जाता है, तो दवा भी सस्ती हो जाती है।

नामचीन कंपनी की दवा जैसी ही असरदार

1996 से 2007 के बीच अमेरिका की फूड एंड ड्रग अथॉरिटी ने 2070 लोगों पर ब्रांडेड और जेनेरिक दवाइयों के असर की पड़ताल की। इसमें पाया गया कि ब्रांडेड की तरह ही जेनेरिक दवाइयां भी असरदार होती हैं। 38 और तरह के ट्रायल के बाद ये पता चला कि दिल की बीमारी में ब्रांडेड दवा जितनी असरदार होती है, उतनी ही उसी फॉर्म्यूले की जेनेरिक दवा भी होती है।

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