सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स के लिए उम्मीदों की नई किरण लाया है ये बैंक

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शांतनु गुहा रॉय

कोलकाता। हर सुबह एशिया के सबसे बड़े रेड लाइट इलाके में शुमार किए जाने वाले सोनागाछी में सेक्स वर्कर्स गंगा के पानी से सूर्य को अर्घ्य देती हैं। उसके बाद तैयार होकर वो करीब-करीब खंडहर हो चुकी एक बिल्डिंग तक पहुंचती दिखती हैं। भले ही ये बिल्डिंग खंडहर बन गई हो, लेकिन सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स के लिए ये ‘उम्मीदों का घर’ है।

इसलिए कहा जाता है इसे ‘उम्मीदों का घर’
बिजनेस टेलीविजन इंडिया (BTVI) ने पड़ताल की कि आखिर इस बिल्डिंग में ऐसा क्या खास है कि इसे सेक्स वर्कर्स उम्मीदों का घर कहती हैं। वजह बहुत खास है। इस बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर पहुंचते ही सेक्स वर्कर्स की उम्मीदों को पंख लगाते हुए तमाम लोग दिखते हैं। एक तरफ सेक्स वर्कर्स की ठीक वैसी ही कतार, जैसा वो हर शाम को ग्राहक की उम्मीद में सोनागाछी की गलियों में लगाती हैं। दूसरी तरफ रुपए गिनती हुईं कुछ महिलाएं। फिर सेक्स वर्कर्स फॉर्म भरने लगती हैं। शाम से लेकर देर रात तक की कतार जहां उन्हें हर वक्त पीड़ा पहुंचाती हैं, वहीं, सुबह की ये कतार उन्हें सुकून देती हैं। सेक्स वर्कर्स यहां कतार लगाती हैं अपनी रकम उस को-ऑपरेटिव बैंक में जमा कराने के लिए, जो काफी जद्दोजहद के बाद 1995 में उस वक्त खुला था, जब आदित्य चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (डीडीएलजे) ने धूम मचा दी थी।

आसान नहीं रही बैंक खोलने की राह
भारत में शायद ही किसी और रेड लाइट एरिया में सेक्स वर्कर्स के लिए बैंक हो, लेकिन यहां इस बैंक को खोलने की ऐसी धुन छाई कि वो तमाम मुश्किलों के बावजूद इसके लिए जुट गए। दरअसल, कानून की वजह से सेक्स वर्कर्स को दिक्कत हुई, क्योंकि एनजीओ खोलने वाले व्यक्ति का नैतिक चरित्र ठीक होने का नियम है। बड़ी जद्दोजहद के बाद इस मुश्किल को दूर किया गया और आखिरकार ‘दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक’ वजूद में आया।

बैंक ने आसान की जिंदगी
दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक बनने से पहले सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स के लिए जैसे जिंदगी नाम की कोई चीज थी ही नहीं। सरकारी सुविधाएं भी उन्हें नहीं मिलती थीं। न उनका आधार कार्ड था और न ही पैन कार्ड, लेकिन बैंक बनने के बाद सिर्फ वो बचत ही नहीं कर रहीं, उनके पास अब सरकारी आईडी कार्ड भी हैं। जिससे उन्हें राशन भी मिल जाता है और टेलीफोन के कनेक्शन से लेकर पासपोर्ट भी वो बनवा लेती हैं।

सेक्स वर्कर्स को मिली बड़ी नियामत
दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक के काम शुरू करने से सोनागाछी की सेक्स वर्कर्स को बड़ी नियामत मिली है। यहां की शताब्दी साहा के मुताबिक बैंक ने उन्हें नई पहचान दी है और उनकी जिंदगी का ये अब हिस्सा है। वो कहती हैं कि दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक महज रुपए जमा करने का जरिया नहीं है, ये एक आंदोलन है। इस आंदोलन ने सोनागाछी से साहूकारों और चिटफंड चलाकर महिलाओं को लूटने वालों की दुकानदारी बंद कर दी है।

इस वजह से महिलाएं बनती हैं सेक्स वर्कर
शताब्दी साहा का कहना है कि गरीबी और भूख की वजह से महिलाएं सेक्स वर्कर बनती हैं। वो चाहती हैं कि किसी तरह उनकी जिंदगी को सुरक्षा मिले। फिर जब उनके बच्चे होते हैं, तो उन्हें भी वो बेहतर भविष्य देना चाहती हैं। बैंक के खुलने से पहले ऐसा सोचना भी असंभव लगता था, लेकिन शताब्दी बैंक को धन्यवाद देती हैं कि उसकी वजह से सेक्स वर्कर अपने बच्चों को शिक्षित कर पा रही हैं। शताब्दी के मुताबिक तमाम सेक्स वर्कर ने अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई है और उनके ये बच्चे अब नौकरी कर रहे हैं। शताब्दी कहती हैं, ‘यहां का हर कोई बैंक को अपनी ताकत मानता है। क्योंकि पास में रकम हो, तभी समाज भी आपको इज्जतदार मानता है।’

लगातार खुल रहे हैं खाते
दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक में लगातार खाते खुल रहे हैं। यहां फिलहाल 30 हजार खाते हैं और बैंक का टर्नओवर 35 करोड़ रुपए हो चुका है। बैंक ने ऐसे में कोलकाता में रियल एस्टेट, जमीन और खंडहर बन चुकी इमारतें खरीदने में भी रुचि दिखाई है। ताकि जरूरत पड़ने पर इन्हें बेचकर अच्छी रकम मिल सके।

बैंक ने दिया अभयदान
दुर्बार आंदोलन शुरू करने वाले समरजीत जाना के मुताबिक बैंक को खुले हुए दो दशक से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन उससे पहले कोलकाता जैसे महानगर में जिंदगी आसान नहीं थी। समरजीत के अनुसार हर पल ऐसा लगता था कि ये विशाल बॉक्सिंग रिंग है और कभी भी जिंदगी की दुश्वारियां उन्हें पटक सकती हैं। समरजीत बताते हैं कि बैंक के खुलने से पहले सोनागाछी में दलालों का बोलबाला था। ये चाहते थे कि सेक्स वर्कर्स की माली हालत कभी ठीक न हो। बैंक ने ऐसे लोगों को दूर कर दिया है। उनके मुताबिक सेक्स वर्कर्स ने इन दलालों से मोर्चा लिया और उन्हें खदेड़ने में सफलता हासिल की। महिलाओं ने इन दलालों से साफ कह दिया कि तुम सिर्फ कस्टमर लाने का काम करो, बाकी सोनागाछी की महिलाएं संभालेंगी। समरजीत के मुताबिक सोनागाछी में हर शाम को दिखने वाली सेक्स वर्कर्स यहीं नहीं रहतीं। तमाम ऐसी भी हैं, जो शाम को इलाके में आती हैं और धंधा करने के बाद सुबह लौट जाती हैं, लेकिन ऐसी महिलाओं के भी खाते इस बैंक में हैं।

दूसरे बैंक भी खोलना चाहते हैं खाते
दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक की सफलता ने सोनागाछी की महिलाओं को इतना ताकतवर बना दिया है कि अब दूसरे सरकारी और निजी बैंक भी उनके खाते खोलना चाहते हैं। दुर्बार के बाद कई और सरकारी बैंकों ने भी सोनागाछी में अपनी शाखाएं खोली हैं।

इस तरह मदद करता है दुर्बार
भारत में वेश्यावृत्ति कानूनन अवैध है, लेकिन पश्चिम बंगाल की सरकार सोनागाछी में रहने वाली सेक्स वर्कर्स को दूसरा काम मुहैया कराने की कोई कोशिश करती नहीं दिखती। दरअसल, कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहता कि सोनागाछी से सेक्स वर्कर्स हटें। ऐसे में दुर्बार आंदोलन ने सेक्स वर्कर्स की भलाई का जिम्मा उठाया। 1992 में इस आंदोलन के तहत महिलाएं एकजुट हुईं, उन्होंने अपने कस्टमरों के लिए कंडोम का इस्तेमाल करना जरूरी कर दिया और आज वो पहले से खुशहाल हैं। दुर्बार आंदोलन यहां आने वाली नई सेक्स वर्कर्स को कुछ दिन रहने के लिए जगह भी दिलाता है। उन्हें सेक्स के धंधे से बचाने के लिए काउंसिलिंग भी की जाती है।

बैंक को इस वजह से धन्यवाद देती हैं वो
सोनागाछी की 45 साल की सेक्स वर्कर प्रतिमा देवी इस बैंक को धन्यवाद देती हैं। प्रतिमा के मुताबिक बैंक की वजह से उन्हें अपने माता-पिता का महंगा इलाज कराने में काफी आसानी हुई। प्रतिमा का कहना है कि बैंक नहीं होता, तो मेरे पास पैसा नहीं होता। अब वो बैंक से पैसे निकालती हैं और अस्पताल जाकर इलाज का खर्च चुका देती हैं। बैंक नहीं होता, तो साहूकारों से उन्हें 360 फीसदी तक के ब्याज में रुपया उधार लेना पड़ता। माता-पिता की ओर से सेक्स के धंधे में धकेली गईं देबी कहती हैं कि बैंक ने उन्हें रुपया ही नहीं दिया, उम्मीद भी दी है। ये पूछने पर कि वो शादी कर सकती थीं, देबी कहती हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके पास दुर्बार समन्वय को-ऑपरेटिव बैंक का खाता है और उसे ही वो अपना पति मानती हैं। आखिर ये बैंक खाता उन्हें सुरक्षा जो देता है।

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