सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, भारत में समलैंगिकता अब अपराध नहीं

113 0

नई दिल्‍ली। भारत में दो वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध बनाना अब अपराध नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 सितंबर) को दो वयस्कों के बीच सहमति से बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 को खत्‍म  कर दिया। अपने ऐतिहासिक फैसले में मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने धारा 377 को मनमाना करार देते हुए व्यक्तिगत चुनाव को सम्मान देने की बात कही है। बता दें कि 17 जुलाई को शीर्ष कोर्ट ने 4 दिन की सुनवाई के बाद इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। समलैंगिकता पर धारा 377 को खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद एलजीबीटी समुदाय के लोग कई राज्यों में खुशी मना रहे हैं।

क्‍या कहा चीफ जस्टिस ने ?

सीजेआई दीपक मिश्रा ने कहा, ‘हर बादल में इंद्रधनुष खोजना चाहिए। समलैंगिक लोगों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। मैं जो हूं वो हूं। लिहाजा जैसा मैं हूं, उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाए। लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी।’ चीफ जस्टिस ने फैसला पढ़ते हुए विलियम शेक्सपियर को भी कोट किया। बता दें कि इंद्रधनुषी झंडा एलजीबीटी समुदाय का प्रतीक है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविल्कर ने कहा कि समान लिंग वाले लोगों के बीच रिश्ता बनाना अब धारा 377 के तहत नहीं आएगा।

क्‍या कहा संविधान पीठ ने ?

संविधान पीठ में शामिल जजों ने अलग-अलग फैसले सुनाए, हालांकि सभी का अभिप्राय एक था। पीठ ने कहा कि समाज को पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए। जजों ने कहा कि संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन जरूरी है। जीवन का अधिकार मानवीय अधिकार है। इस अधिकार के बिना बाकी अधिकार औचित्यहीन हैं।  कोर्ट ने कहा कि सेक्शुअल ओरिएंटेशन (यौन रुझान) बायलॉजिकल है। सबको समान अधिकार सुनिश्चित करने की जरूरत है।

व्‍यक्तिगत चॉइस का सम्‍मान जरूरी

कोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत चॉइस को सम्मान देना होगा। एलजीबीटी समुदाय को भी समान अधिकार है। इस पर रोक संवैधानिक अधिकारों का हनन है। राइट टु लाइफ उनका अधिकार है और यह सुनिश्चित करना कोर्ट का काम है। कोर्ट ने कहा कि सहमति से बालिगों के समलैंगिक संबंध हानिकारक नहीं है। आईपीसी की धारा 377 संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मौजूदा रूप में सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारी विविधता को स्वीकृति देनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर के समलैंगिकों में है जश्न का माहौल

धारा 377 : जानिए किन लोगों ने लड़ी समलैंगिक समुदाय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 का अपना ही फैसला पलटा

बता दें कि गुरुवार को दिए गए ताजा निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2013 में सुनाए गए अपने ही फैसले को पलट दिया है। अपने उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2009 के दिल्‍ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को अपराध करार दिया था। सीजेआई दीपक मिश्रा, के साथ जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संवैधानिक पीठ ने 10 जुलाई को मामले की सुनवाई शुरू की थी और 17 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

जानिए कैसे प्रचलन में आया एलजीबीटी समुदाय का इंद्रधनुषी रंग वाला झंडा

क्‍या है धारा 377 धारा 377 ?

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 ‘अप्राकृतिक अपराधों’ से जुड़ी है। धारा 377 में अप्राकृतिक यौनाचार को अपराध माना गया है। इसके तहत किसी महिला, पुरुष या जानवरों के साथ अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाने वाले को आजीवन कारावास या 10 साल तक कैद की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो धारा-377 के मुताबिक अगर दो वयस्‍क आपसी सहमति से भी समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो वह अपराध होगा।

Related Post

रांची के रंजीत ने बनाया भारत का पहला इंसानी रोबोट, जो बोलता है फर्राटेदार हिंदी

Posted by - October 6, 2018 0
हिंदी के अलावा भोजपुरी, मराठी और अंग्रेजी भी बोल सकती है इंसानी रोबोट ‘रश्मि’ रांची। तकनीक के मामले में अब…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *