भगवान कृष्ण को आती थीं 64 कलाएं, इसलिए उन्हें कहते हैं गुरुओं का गुरु

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लखनऊ। जन्माष्टमी का त्योहार रविवार और सोमवार को मनाया जाने वाला है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उनकी जन्म की कथा तो सभी को पता है और ये भी सब जानते हैं कि भगवान कृष्ण को 64 कलाएं आती थीं, लेकिन शायद कम ही लोगों को पता है कि उन्हें गुरुओं का गुरु भी कहा जाता है। इसकी वजह ये है कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने वो व्यावहारिक ज्ञान दिया, जो आजकल के मॉर्डन गुरुओं को देते देखा जाता है।

वक्त के मुताबिक ढलने की कला

भगवान कृष्ण ने बचपन में गायें चराईं। फिर मथुरा और द्वारका के शासक बने और महाभारत युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई। यानी कृष्ण ने सिखाया कि किसी एक लकीर में खुद को नहीं रखना चाहिए। उन्होंने ज्ञान दिया कि वक्त के मुताबिक व्यक्ति को खुद को ढालना आना चाहिए।

हमेशा दोस्ती निभाने का ज्ञान

कृष्ण तो पांडवों के रिश्तेदार भी थे और दोस्त भी। जब पांडव राज कर रहे थे, तब भी भगवान कृष्ण उनके दोस्त रहे और जब पांडवों ने वनवास किया, उस वक्त भी दोस्ती निभाई। यानी कठिन से कठिन हालात में दोस्ती न तोड़ने का ज्ञान भगवान कृष्ण ने दिया।

सबसे बड़े स्ट्रैटेजिस्ट

भगवान कृष्ण ने महाभारत का युद्ध जीतने के लिए पांडवों के साथ मिलकर ऐसी स्ट्रैटेजी बनाई कि कौरवों के पास विशाल सेना और भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथियों के रहते भी वे हार गए। इस तरह कृष्ण को मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट कहना गलत नहीं होगा। यानी वो गुरुओं के भी गुरु हुए।

हमेशा खुश रहने और हिम्मत न हारने का ज्ञान दिया

भगवान कृष्ण ने गीता में व्यर्थ चिंता न करने और किसी से न डरने को कहा। यानी उनका कहना है कि हमेशा खुश रहना चाहिए। उन्होंने ये भी सिखाया कि सफलता न मिलने पर भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। महाभारत में जयद्रथ वध से पहले जब अर्जुन ने आत्महत्या कर लेने का फैसला कर लिया था, तब कृष्ण ने ही उन्हें अपनी योगमाया से उन्हें ऐसा करने से रोका और सूरज को फिर चमकाकर जयद्रथ का वध कराया। कृष्ण ने अनुशासन में रहने और मौजूदा वक्त पर ध्यान देने का मंत्र भी दिया।

कमजोरों की मदद करने की सीख दी

अपने दोस्त सुदामा के लिए उन्होंने महल बनवाकर ये ज्ञान दिया कि रिश्तों में हमेशा कमजोर की मदद करनी चाहिए और अपने ओहदे को दोस्ती की राह में बाधा नहीं बनने देना चाहिए।

कूटनीति के माहिर खिलाड़ी

कहते हैं कि प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज होता है। कृष्ण ने इन दोनों बातों को अपने जीवन की घटनाओं से साबित करके दिखाया। चाहे वो रुक्मिणी का हरण हो या द्रोण, भीष्म, जरासंध, दुर्योधन और कर्ण के वध का ही मामला क्यों न हो। तभी कहा जाता है- वसुदेवें सुतं देवं, कंस चाणूर मर्दनम्…देवकी परमानंदम्, कृष्णं वंदे जगतगुरुम…

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