अनपढ़ की क्या कहें, पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी पुरुषों से मिलती है कम मजदूरी

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नई दिल्ली। बीते करीब 18 साल में दैनिक मजदूरी में तो हर साल करीब 7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन ये बढ़ोतरी सिर्फ पुरुषों को फायदा पहुंचा रही है। महिला मजदूरों को अब भी पुरुषों के मुकाबले कम मजदूरी मिल रही है, जबकि वो पुरुषों के मुकाबले शायद कहीं ज्यादा काम करती हैं।

NSSO की रिपोर्ट ये कहती है

राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन यानी एनएसएसओ की रिपोर्ट साफ करती है कि भारत में पुरुष और महिला दिहाड़ी मजदूरों को मिलने वाले पैसे में बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2011-12 में 12 करोड़ लोग दैनिक मजदूरी करते थे। इनमें से पुरुषों के मुकाबले महिलाएं 34 फीसदी कम दिहाड़ी पर काम करती मिलीं। हालांकि, मनरेगा योजना ने महिलाओं और पुरुषों को मिलने वाली दिहाड़ी पाट दी है, लेकिन ये योजना सिर्फ ग्रामीण इलाकों तक सीमित है और इसका लाभ शहरों में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों को नहीं मिलता है।

पढ़ी-लिखी महिलाओं से भी भेदभाव

एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक अनपढ़ महिला मजदूरों को ही नहीं, बल्कि पढ़ी-लिखी लड़कियों को भी कम तनख्वाह पर काम करना पड़ता है। सर्वे में पाया गया कि आम तौर पर एक ग्रेजुएट महिला को जहां हर रोज औसत 609 रुपए मिलते हैं, वहीं ग्रेजुएट पुरुष की एक दिन की औसत तनख्वाह 805 रुपए है।

हरियाणा में सबसे ज्यादा मजदूरी

एनएसएसओ का सर्वे बताता है कि हरियाणा में दैनिक मजदूरी करने वाले को औसतन हर रोज 783 रुपए मिलते हैं। जबकि असम में 607 रुपए, झारखंड में 543 रुपए, जम्मू-कश्मीर में 495 रुपए, पंजाब में 362 रुपए, तमिलनाडु में 388 रुपए और गुजरात में 320 रुपए ही औसतन हर रोज दिहाड़ी के तौर पर दिए जाते हैं।

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