भीमा कोरेगांव हिंसा : 5 लोगों की गिरफ्तारी पर SC ने केंद्र व राज्य सरकार से मांगा जवाब

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  • कोर्ट ने की तल्‍ख टिप्‍पणी, कहा – विरोध लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है, दबाएंगे तो विस्‍फोट हो जाएगा
  • 5 सितंबर तक नजरबंद रहेंगे पांचों वामपंथी विचारक, अब सुप्रीम कोर्ट में 6 सितंबर को होगी सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में मंगलवार को गिरफ्तार किए गए पांच वामपंथी विचारकों को 5 सितंबर तक नजरबंद रखने का आदेश दिया है। पुणे पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिका पर बुधवार (29 अगस्‍त) को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 6 सितंबर को मामले की अगली सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, महाराष्ट्र सरकार और अन्‍य पक्षकारों से 5 सितंबर तक जवाब भी मांगा है।

क्‍या कहा सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने ?

सुप्रीम कोर्ट ने पांचों बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी पर तल्‍ख टिप्‍पणी की। कोर्ट ने कहा – ‘असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है, इसकी इजाजत नहीं दी तो प्रेशर कुकर फट सकता है।’ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता के वकील राजीव धवन ने कहा कि गिरफ्तारियां अवैध और मनमाने तरीके से की गई हैं। इन गिरफ्तारियों के विरोध में इतिहासकार रोमिला थापर और चार आरोपियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। बता दें कि पुणे पुलिस की इस कार्रवाई में पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं गौतम नवलखा, वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वरनोन गोंजाल्विस को गिरफ्तार किया गया है।

दस्तावेज मराठी में तो ट्रांजिट रिमांड कैसे दी ?

गौतम नवलखा की गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्‍ली हाईकोर्ट ने सरकारी वकील से पूछा कि नवलखा या उनके वकीलों को गिरफ्तारी का मेमो क्यों नहीं दिया गया? किसी नागरिक को हिरासत में रखने का हर मिनट मायने रखता है। सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि दस्तावेज मराठी में थे और उन्हें उसकी ट्रांसलेट की गई कॉपी नहीं दी गई। इस पर हाईकोर्ट ने पूछा कि जब दस्तावेज मराठी में थे तो निचली अदालत ने ट्रांजिट रिमांड कैसे दे दिया? इस बीच महाराष्ट्र पुलिस ने अदालत को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की जानकारी दी। अब हाईकोर्ट शीर्ष अदालत के आदेश की कॉपी मिलने के बाद गुरुवार को केस पर सुनवाई करेगा।

इनमें से 3 पहले भी काट चुके हैं जेल

पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार पांच कार्यकर्ताओं में से तीन ऐसे हैं,  जो पहले भी जेल जा चुके हैं। वर्नोन गोंजाल्विस मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट और रूपारेल कॉलेज एंड एचआर कॉलेज के पूर्व लेक्चरर हैं। उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था। वो 6 साल जेल में रहे थे, हालांकि बाद में साक्ष्य के अभाव में उन्‍हें बरी कर दिया गया था। वहीं वरवर राव को इमरजेंसी के दौरान अक्टूबर में आंतरिक सुरक्षा रखरखाव कानून (मीसा) के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन्‍हें 1975 और 1986 के बीच कई मामलों में एक से ज्यादा बार गिरफ्तार किया गया। 2003 में उन्हें रामनगर साजिश कांड में बरी किया गया और 2005 में फिर जेल भेज दिया गया था। इसी तरह अरुण फरेरा को भी वर्ष 2007 में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 5 साल जेल में बिताने पड़े।

विवादों में रहा है यूएपीए कानून

बता दें कि पांचों वामपंथी विचारकों को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया है। यह अधिनियम वर्ष 1967 में लाया गया था। यह कानून शुरू से ही विवादों में रहा है। इस कानून के तहत अधिकारियों को यह अधिकार है कि वे छापेमारी कर बिना वारंट के किसी भी व्‍यक्ति को इस आधार पर गिरफ्तार कर सकते हैं कि उसके आतंकियों से रिश्ते हैं या फिर वह गैरकानूनी गतिविधियों में संलिप्त है। इस कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता।

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