आपकी हर जींस और टी-शर्ट इस तरह पहुंचाती है पर्यावरण को नुकसान

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न्यूयॉर्क। रंग-बिरंगे कपड़े भला किसे नहीं भाते, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन कपड़ों को बनाने में हम पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाते हैं ? आप सोच रहे होंगे कि कपड़े तो ईको फ्रेंडली कहे जाते हैं, फिर इनसे पर्यावरण को कैसा नुकसान ! तो चलिए, हम बताते हैं आपको कि जब भी कोई कपड़ा बनता है, तो वो पर्यावरण को कितना प्रदूषित करता है।

तेल के बाद दूसरे नंबर का प्रदूषक
कपड़े बनाने वाली इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्री में से है, लेकिन जिन फैक्ट्रियों में कपड़े बनते हैं, वो पर्यावरण में प्रदूषण भी खूब फैलाते हैं। प्रदूषण इतना कि कपड़े बनाने वाली इंडस्ट्री को इस मामले में तेल उत्पादन में होने वाले प्रदूषण के बाद ही रखा गया है। जबकि, हमें लगता है कि कोयले से बिजली बनाने, पहाड़ों में खुदाई और नदियों में सीवेज डालना ही सबसे ज्यादा प्रदूषण की वजह होती है।

कपास उगाने से ही हो जाती है प्रदूषण की शुरुआत
विशेषज्ञों के अनुसार कपास उगाने की प्रक्रिया के साथ ही प्रदूषण फैलाने की शुरुआत हो जाती है। कपास की फसल में कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है। फिर कपड़े बनाने में जिन रंगों का उपयोग किया जाता है, वे भी कम खतरनाक नहीं होते। जब कपड़ा बनकर तैयार होता है, तो वो काफी प्रदूषक तत्व धरती तक पहुंचा देता है।

एक टी-शर्ट और जींस बनाने में लगता है इतना पानी
आप भले ही जींस और टी-शर्ट पहनकर खुश होते हैं, लेकिन ये शायद आपको पता नहीं होगा कि एक जींस और टी-शर्ट बनाने में करीब 5 हजार गैलन पानी इस्तेमाल हो जाता है और इस पानी में मिलकर प्रदूषक तत्व जमीन और अन्य जगह पहुंचते हैं।

इस तरह बढ़ता है प्रदूषण
कपड़ा बनाने में प्रदूषण किस तरह बढ़ता है, उसे जानकर आप हैरान हो सकते हैं। दुनिया में 2.5 फीसदी जमीन पर कपास उगाया जाता है। इस कपास को उगाने में कुल उत्पादित कीटनाशक में से 25 फीसदी और अन्य कृषि आधारित रसायनों में से 10 फीसदी का इस्तेमाल होता है। बता दें कि कपड़े बनाने के उद्योग सबसे ज्यादा चीन में हैं। इसके बाद भारत, अमेरिका, पाकिस्तान और ब्राजील का नंबर आता है।

उजबेकिस्तान का है उदाहरण
उजबेकिस्तान नाम का देश दुनिया में कपास उगाने में छठे नंबर पर है। 1950 के दशक में मध्य एशिया की दो नदियां अमू और सिर को उजबेकिस्तान और पड़ोसी देश तुर्कमेनिस्तान के कपास उगाने वाले इलाकों तक पहुंचाने के लिए अरल सागर से मोड़ दिया गया। आज हालत ये है कि अरल में पानी का स्तर 50 साल पहले के मुकाबले 10 फीसदी से ज्यादा गिर गया है। पानी की कमी होने से इसमें नमक की मात्रा भी बढ़ गई है और जांच से पता चला है कि अरल सागर में कीटनाशक और अन्य रसायनिक खाद भी काफी मात्रा में हैं। पानी सूखने की वजह से धूल भी इलाके में पहले के मुकाबले ज्यादा हो गई है और इस धूल के साथ खतरनाक रसायन भी लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं। इसके अलावा ऐसा ही नजारा पाकिस्तान में सिंधु नदी, ऑस्ट्रेलिया में मरे और डार्लिंग नदियों के बेसिन और अमेरिका और मेक्सिको में बहने वाली रियो ग्रांदे नाम की नदियों में भी देखा जा रहा है।

कपड़ों को रंगने से हो रहा असर
कपड़ों को रंगीन बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले डाइ से भी पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंच रहा है। इंडोनेशिया में सिटारम नदी के पास कपड़ा बनाने वाली फैक्ट्रियां हैं। इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले पानी की वजह से सिटारम दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार की जाने लगी है। इससे नदी के किनारे रहने वाले 50 लाख लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।

फैक्ट्रियों का पानी समुद्रों को कर रहा प्रदूषित
कुल मिलाकर कपड़ा बनाने वाली इंडस्ट्री में हर साल अरबों गैलन पानी का इस्तेमाल होता है। इस पानी को साफ किए बगैर नदियों में छोड़ा जाता है और फिर वहां से समुद्रों तक पहुंचकर ये दुनियाभर में फैल रहा है। एक रिसर्च के मुताबिक चीन से ही इस तरह का करीब 40 फीसदी रसायन मिला पानी बिना ट्रीटमेंट के नदियों में गिराया जाता है।

किस तरह रोक सकते हैं प्रदूषण
कपड़ा बनाने वाली इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण को रोकने के तमाम तरीके तो हैं, लेकिन इन्हें अभी पूरी दुनिया में लागू नहीं किया जा सका है। मसलन, विकासशील देशों में दुनियाभर का 60 फीसदी कपड़ा बनता है। चीन से दुनियाभर में 13 फीसदी कपड़ों का निर्यात होता है। ऐसे में प्रदूषण को रोकने के लिए ऐसे कपड़े बनाने पर जोर है, जो ऐसे कपास से बनें, जिन्हें उगाने में कम रसायनों का इस्तेमाल हो। साथ ही कपड़ों को रंगने के लिए बाजार में ऐसे डाई आ गए हैं, जो बिना पानी के कपड़ों को रंगीन बनाते हैं। दुनिया की कई कंपनियां इनका इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन अब भी विकासशील और एशियाई देशों में नई तकनीकों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

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