मल को देखकर नाक-भौं मत सिकोड़िए, बीमारी का हो सकता है सफल इलाज !

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वॉशिंगटन। मल को देखते ही हम अपनी आंखें फेर लेते हैं। नाक पर रुमाल रखते हैं, लेकिन यही मल काफी काम का भी है। सुनकर आपको अचरज हो रहा होगा, लेकिन दुनिया में कई देशों में इंसान के मल को लेकर जो रिसर्च हुआ है और इसके नतीजे बताते हैं कि ये आपके काफी काम का होता है।

बीमारी के इलाज में इंसान का मल !
रिसर्च से पता चला है कि इंसान की तमाम बीमारियों का इलाज उसके मल से ही किया जा सकता है। इनमें खासतौर पर क्लोस्ट्रीडियम डिफिसाइल यानी सीडीआई नाम का डायरिया भी है। बता दें कि इस डायरिया का बैक्टीरिया दवाइयों से जल्द खत्म नहीं होता, लेकिन इंसान के मल के ट्रांसप्लांट से इसे नष्ट होते देखा गया है।

चीन में हुआ था पहला मल ट्रांसप्लांट
अब तक आपने किडनी, लिवर और आई ट्रांसप्लांट के बारे में सुना होगा और मल का ट्रांसप्लांट सुनकर आपको हैरत हो रही होगी, लेकिन पश्चिमी देशों में इसे लेकर काफी शोध हो चुका है। बता दें कि सबसे पहले मल को इंसान के शरीर में ट्रांसप्लांट किए जाने का कारनामा चौथी सदी में चीन के एक चिकित्सक ने किया था। उसने फूड प्वॉइजनिंग से बीमार हुए लोगों को मल खिलाया था। इससे उसने मरीजों के ठीक होने का दावा भी किया था।

एंटीबायटिक्स से इसलिए होता है नुकसान
जी हां। रिसर्च से पता चला है कि इंसान की आंतों में 300 से 500 तरह के बैक्टीरिया होते हैं। इनमें से काफी बैक्टीरिया स्वास्थ्य के लिए अच्छे भी होते हैं। किसी बीमारी में जब हम एंटीबायटिक लेते हैं, तो ये अच्छे बैक्टीरिया भी मर जाते हैं। इसके लिए डॉक्टरों को बैक्टीयोथेरेपी के जरिए फिर से अच्छे बैक्टीरिया पैदा करने चाहिए, लेकिन ऐसा किया नहीं जाता है। इससे संबंधित बीमारी तो ठीक हो जाती है, लेकिन स्वास्थ्य को काफी नुकसान भी पहुंचता है।

अच्छे बैक्टीरिया का ये होता है योगदान
आंतों में अच्छा बैक्टीरिया खाने को पचाने, इम्युनिटी और बाकी खतरनाक बैक्टीरिया को मारने का काम करता है। ऐसे में बैक्टीयोथेरेपी के जरिए दोबारा शरीर में अच्छा बैक्टीरिया पनपाने का काम इंसानी मल से किया जा सकता है।

इस तरह किया जाता है मल का ट्रांसप्लांट
बीमार व्यक्ति का मल लेकर ट्रांसप्लांट नहीं किया जा सकता। इसके लिए उसके किसी रिश्तेदार का मल लिया जाता है। फिर उसमें पानी, नमक, दही, दूध और फाइबर मिलाया जाता है। इसके बाद सीधे उसे सीरिंज के जरिए इंसान के मलद्वार के रास्ते ही आंतों तक पहुंचाया जाता है। इसके अलावा नाक में ट्यूब डालकर मल को पेट में पहुंचाया जाता है। हालांकि, ट्रांसप्लांट से पहले देखा जाता है कि मल से संबंधित बीमार को कोई नुकसान तो नहीं होगा।

कितने मरीज ठीक होने का दावा ?
इस तरह मल के ट्रांसप्लांट से 92 फीसदी सीडीआई के मरीजों के ठीक होने का दावा कई शोध में किया गया है। 2011 में एक शोध में पता चला था कि जिन्हें पेट से जुड़ी बीमारियां हैं, उनमें मल का ट्रांसप्लांट करने से सौ फीसदी मरीज ठीक हो गए। इन्हें दोबारा सीडीआई भी नहीं हुई।

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