स्‍टडी : …तो इस वजह से अवैध आप्रवासियों को पसंद नहीं करते देश

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नई दिल्ली। अमेरिका, भारत हो या कोई और देश, कहीं भी विदेशियों का स्वागत नहीं किया जाता है। अगर कानूनी मंजूरी के बिना आप्रवासी सीमा पार करते हैं, तो उन्हें घुसपैठ माना जाता है। अवैध आप्रवासियों पर किन कारणों की वजह से लोग सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, ये जानने के लिए अमेरिका में एक स्टडी की गई।

ऐसे की गई स्टडी

स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने अमेरिकी नागरिकों का एक समूह तैयार किया और उन्हें आप्रवासन के लिए नियम बनाने वालों की जगह पर रखा गया। उनसे ये तय करने को कहा गया कि किसे वो लोग देश में आने देना जाहते हैं और किसे नहीं। फिर चॉइस बेस्ड कॉंजॉइंट एनालिसिस सर्वे से पैटर्न बनाया गया जिसके जरिए ये जानने की कोशिश की गई कि आम अमेरिकी नागरिक किन लोगों को अपने देश में आने देना चाहते हैं और किसे नहीं।

क्‍या निकला स्‍टडी का निष्‍कर्ष ?

स्टडी से ये बात सामने आई कि इकोनॉमिक सेल्फ इंटरेस्ट और सोशियो ट्रॉपिक कंसर्न दो ऐसी चीजें हैं जिसकी वजह से अमेरिकी नागरिक आप्रवासियों को कुछ नौकरियों में अपना प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं। सोशियो ट्रॉपिक कंसर्न की बात करें तो इसमें अमेरिकी नागरिक शिक्षित और अनुभवी लोगों को पसंद करते हैं जो देश में आर्थिक रूप से योगदान दे सकते हैं। रिसर्च में उन सवालों के जवाब भी खोजे गए कि आखिर क्यों अधिकतर आप्रवासियों को पसंद नहीं किया जाता है। इस बारे में गोरे अमेरिकी नागरिकों का कहना था कि वो यूरोप के आप्रवासियों को ज्यादा पसंद करेंगे क्योंकि वो भी गोरे होते हैं और अंग्रेजी भी जानते हैं।

भारत में गंभीर बनी समस्या

भारत की बात की जाए तो जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हुआ तब नरसंहार और बलात्कार से बचने के लिए बांग्लादेशी भारत में आ गए थे। ज्यादातर लोग फिर भारत में ही बस गए। 24 दिसंबर, 1971 के बाद घुसपैठ करने वालों को असम समझौते में अवैध आप्रवासियों के तौर पर जाना जाने लगा। 1991 की जनगणना के बाद गंभीर समस्या तब हो गई जब असम और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती राज्यों में मुसलमानों की संख्या बहुत बढ़ गई। पश्चिम बंगाल में साल 1961-71 तक मुस्लिमों की संख्या 29.76 प्रतिशत थी, वहीं हिंदुओं की संख्या सिर्फ 25.75 प्रतिशत थी। साल 2001-11 तक मुस्लिमों की संख्या 21.81% और हिंदुओं की संख्या 10.81 प्रतिशत थी। असम में साल 1961-71 में हिंदुओं की संख्या 34.49 प्रतिशत और मुस्लिमों की संख्या 29.89 प्रतिशत थी, वहीं 2001-11 के दौरान यहां हिंदुओं की संख्या 10.89 और मुस्लिमों की संख्या 29.59 प्रतिशत थी। इसकी वजह से बड़े पैमाने पर समुदाय में तनाव पैदा होने लगा।

असम में तैयार हुआ NRC

आप्रवासी के नियम तय करने वालों के लिए भी ये एक गंभीर समस्या बन गई। जब असम में नागरिकों का नेशनल रजिस्टर (NRC) का फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया गया, तब उस लिस्ट में 40 लाख लोगों को शामिल नहीं किया गया। इन्हें अप्रवासियों के शिविरों में भेजा जा सकता है जब तक उन्‍हें फिर से बांग्लादेश न भेजा जा सके। कुछ ऐसा ही हाल अमेरिका में भी है। वहां भी बिना दस्तावेजों के अमेरिका आने वाले आप्रवासी परिवारों पर ट्रंप प्रशासन नीतियां तैयार कर रही है।

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