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ऐसा हाल रहा, तो खत्म हो जाएगा पुराणों में वर्णित कल्पवृक्ष, यूपी में तीन जगह हैं ये पेड़

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लखनऊ। पुराणों में एक पेड़ के बारे में लिखा है। इस पेड़ को कल्पवृक्ष कहा गया है। कल्पवृक्ष यानी जो सबकी इच्छा पूरी करता हो। ये पेड़ यूपी में इटावा और बाराबंकी में हैं, लेकिन दोनों की ही हालत ऐसी है कि कब ये खत्म होकर विलुप्त की स्थिति में पहुंच जाएं, कहना मुश्किल है।

इसे कहा जाता है कल्पवृक्ष
पुराणों में जिस पेड़ को कल्पवृक्ष बताया गया है, वो दरअसल पारिजात का पेड़ है। पारिजात के दो पेड़ इटावा के वन विभाग दफ्तर परिसर में लगे हैं। वहीं, एक अन्य पेड़ बाराबंकी जिले के रामनगर में है। जबकि ललितपुर के एसएस आवास परिसर में भी पारिजात का पेड़ लगा है, लेकिन चारों पेड़ पुराने होने की वजह से खत्म होने के कगार पर हैं। पेड़ों के तने खोखले हो रहे हैं और कब ये गिर जाएं, इसका किसी को पता नहीं है। रखरखाव की कमी की वजह से पारिजात के पेड़ों पर कीड़े और दीमक भी लग गए हैं। इन पेड़ों में अब फूल भी नहीं खिलते।

ऐसा होता है पारिजात का पेड़
दिखने में सेमल के पेड़ जैसा पारिजात काफी बड़ा होता है। इसका तना भी काफी मोटा होता है। अगस्त में पारिजात के फूल खिलने का सीजन होता है और सफेद रंग के फूल सूखने के बाद सुनहरे रंग के हो जाते हैं, लेकिन यूपी में चार जगह लगे पारिजात के पेड़ों पर अब फूल नहीं आते।

पारिजात को इसलिए कहते हैं कल्पवृक्ष
पुराणों में लिखा है कि समुद्र मंथन में जो रत्न मिले थे, उनमें पारिजात का पेड़ भी था। इसे कल्पवृक्ष इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इसके गूदे को सुखाकर आटा बनाया जाता था। पारिजात की छाल से थैले और वस्त्र बनते थे। इसका इस्तेमाल कई तरह की आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने में भी होता रहा है। प्राचीन काल में लोगों की जरूरतें कम थी और पारिजात का पेड़ इंसान के काम आता था। इसी वजह से इसे कल्पवृक्ष यानी कामनाएं पूरी करने वाला माना गया।

पारिजात मूल रूप से अफ्रीकी पेड़
पारिजात के पेड़ का वैज्ञानिक नाम आडानसोनिया डिजिटाटा है। अंग्रेजी में इसे बाओबाब कहा जाता है। ये पेड़ मूल रूप से अफ्रीका का है। लोग दावा करते हैं कि पेड़ की उम्र एक से पांच हजार साल तक होती है। वैसे महाराष्ट्र में हरसिंगार को ही पारिजात कहा जाता है, लेकिन वो असली पारिजात नहीं होता।

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