शोधकर्ताओं ने बनाया ईको-फ्रेंडली डायपर, जो पूरी तरह किया जा सकेगा नष्ट

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  • मद्रास आईआईटी के रसायन विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने विकसित किया सुपर एब्जोर्बेंट पॉलिमर

नई दिल्‍ली। आजकल शहरी क्षेत्रों में शिशुओं की देखभाल के लिए डिस्पोजेबल डायपर का उपयोग आम हो गया है। अब तो गांवों में भी डायपर पहुंच गए हैं। यही नहीं, बुढ़ापे से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्ध व्यक्तियों के लिए भी डायपर का इस्‍तेमाल किया जाता है। डायपर में खास तरह के अवशोषक पॉलिमर (एसएपी) का इस्‍तेमाल किया जाता है, जो बड़ी मात्रा में तरल पदार्थ को अवशोषित कर सकते हैं। ये अवशोषक कृत्रिम पदार्थों से बने होते हैं और जैविक रूप से ये पूरी तरह से नष्‍ट नहीं होते। यही कारण है कि इस्‍तेमाल हो चुके डायपर का सुरक्षित निपटारा पर्यावरण के लिए एक प्रमुख समस्या है।

मद्रास आईआईटी के शोधकर्ता जिन्होंने विकसित किया है नया पॉलिमर

आईआईटी मद्रास ने बनाया सुपर एब्जोर्बेंट पॉलिमर

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT), मद्रास के रसायन विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने इस समस्या के समाधान के लिए काइटोसैन, साइट्रिक एसिड और यूरिया को मिलाकर सुपर एब्जोर्बेंट पॉलिमर विकसित किया है। यह नया पॉलिमर जैविक रूप से अपघटित हो सकता है। काइटोसैन समुद्री खाद्य पदार्थों से मिलता है और यह एक प्रकार का शर्करा है। इस पॉलिमर को बनाने के लिए काइटोसैन, साइट्रिक एसिड और यूरिया को 1:2:2  के अनुपात में मिलाया गया है। यह अध्ययन शोध पत्रिका कार्बोहाड्रेट पॉलिमर्स में प्रकाशित किया गया है।

कैसे तैयार किया नया पॉलिमर ?

काइटोसैन, साइट्रिक एसिड और यूरिया को 1:2:2  के अनुपात में मिलाने के बाद इस मिश्रण को अत्यधिक चिपचिपे और छिद्रयुक्त क्रॉसलिंक्ड जेल के रूप में परिवर्तित करने के लिए एक बंद कंटेनर में 100  डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया गया। इसके बाद अवशिष्ट विलायक हटाने के लिए इस जेल को सुखाया गया है और आगे के अध्ययन के लिए इसे पाउडर के रूप में परिवर्तित किया गया है।

क्‍या है इसकी खासियत ?

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस सुपर एब्जोर्बेंट में तरल पदार्थ को सोखने की क्षमता काफी ज्‍यादा है। प्रत्येक एक ग्राम पॉलिमर 1250 ग्राम तक पानी सोख सकता है। अभी बाजार में बिकने वाले बेबी डायपर से अगर तुलना की जाए तो नए पॉलिमर की पानी सोखने की क्षमता अत्‍यंत प्रभावी है। इस नए जेल की पानी सोखने की क्षमता आमतौर पर मिलने वाले बेबी डायपर की अपेक्षा करीब आठ गुना अधिक है।

नए जेल के अध्‍ययन में क्‍या पता चला ?

शोधकर्ताओं ने पाउडर एक्स-रे विवर्तन विधि का उपयोग करके इस क्रॉसलिंक्ड पॉलिमर जेल की संरचना का विश्लेषण किया। साथ ही विभिन्न विश्लेषणात्मक तकनीकों जैसे- ठोस परमाणु चुंबकीय प्रतिध्वनि, फूरियर-ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी और थर्मोग्रेविमीट्रिक विश्लेषण द्वारा इसके गुणों का अध्ययन बड़े पैमाने पर किया गया। प्रमुख शोधकर्ता डॉ. राघवचारी दामोदरन के अनुसार, ‘अपने वर्तमान स्वरूप में  हमारा बनाया गया यह मैटेरियल व्यावसायिक रूप से उपलब्ध डायपर की तरह तेजी से पानी को सोख पाने में सक्षम नहीं है, लेकिन यह परंपरागत रूप से प्रचलित सिंथेटिक डायपर के विपरीत जैविक रूप से अपघटित हो सकता है।’

पर्यावरण के लिए सुरक्षित है नया जेल

डॉ. दामोदरन ने इस जेल के संश्लेषण प्रक्रिया को पर्यावरण के लिए मददगार बताया है। इसका कारण यह है कि इस जेल सिंथेटिक रसायनों की बजाय इससे जुड़े प्रयोगों में पानी का उपयोग किया गया है। एक अन्य शोधकर्ता प्रोफेसर ए. नारायणन कहते हैं, ‘इस नए मैटेरियल का परीक्षण जब पौधों पर किया गया तो उनके विकास में उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले। हमने पाया कि इसके उपयोग से घर पर गमले में मिर्च जैसे पौधों को चार से पांच दिन के अंतराल पर पानी देकर भी उगाया जा सकता है।’

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