जानते हैं, महाभारत युद्ध के दौरान लाखों सैनिकों के लिए कौन बनाता था भोजन

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उडुपी। कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध होने वाला था। दोनों अपने-अपने पक्ष में राजाओं को ला रहे थे। उस दौर में जितने भी राजा थे, उनमें से हर कोई युद्ध में शामिल था। सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण के भाई श्री बलराम और कृष्ण का साला रुक्मी इस युद्ध में शामिल नहीं हुए थे। कहा जाता है कि युद्ध में कौरवों और पांडवों की ओर से 50 लाख योद्धा शामिल हुए। अब जरा सोचिए, इतनी बड़ी सेना के लिए भोजन कौन बनाता था। तो चलिए, हम बताते हैं आपको कि कौरवों और पांडवों की सेना को भोजन कराने का जिम्मा किसने संभाला था।

उडुपी के राजा बनाते थे भोजन

कर्नाटक के उडुपी में एक मठ है। यहां महाभारत से जुड़ी एक अनोखी कथा भक्तों को सुनाई जाती है। कथा के अनुसार, उडुपी के राजा भी महाभारत के युद्ध में शामिल होने गए थे। कौरवों और पांडवों ने उन्हें अपनी ओर शामिल करने की कोशिश की। इससे उनका मन विरक्त हो गया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि वो युद्ध नहीं करना चाहते। इस पर भगवान ने पूछा कि फिर वो क्या करेंगे। इस पर उडुपी के राजा ने कहा कि वो कौरवों और पांडवों की सेना के 50 लाख सैनिकों के लिए भोजन बनाएंगे। उनकी ये बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ये जिम्मेदारी वो लें। इसके बाद उडुपी के राजा ने भोजन बनाने के लिए जरूरी इंतजाम कर लिया।

नहीं बचता था अन्न का एक भी दाना

उडुपी के राजा महाभारत युद्ध के दौरान भोजन बनाकर सैनिकों को खिलाने लगे, लेकिन अचरज की बात ये थी कि हर रोज हजारों सैनिक मारे जाते, लेकिन जो भोजन बनता, वो इतनी सटीक मात्रा में होता कि अन्न का एक भी दाना नहीं बचता था। ऐसे में सब हैरत में थे कि आखिर उडुपी के राजा को कैसे पता चल जाता है कि आज इतने सैनिक युद्धभूमि में खेत रहेंगे !

मूंगफली के छिलकों ने खोला रहस्य

जरूरत के मुताबिक ही सेना के लिए भोजन बनने का रहस्य आखिर महाभारत युद्ध के बाद खुला। उडुपी मठ में सुनाई जाने वाली कथा कहती है कि अपने राज्याभिषेक के दिन युधिष्ठिर ने उडुपी के राजा से ये राज जानना चाहा। इस पर राजा ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के लिए वो रोज मूंगफली भेजते थे। भगवान जब मूंगफली खा लेते, तो उनके छिलके वो गिनते थे। राजा ने युधिष्ठिर को बताया कि जितनी मूंगफली भगवान खाते, उससे 1 हजार गुना सैनिक अगले दिन मारे जाते थे। यानी अगर श्रीकृष्ण ने 20 मूंगफली खाई, तो 20 हजार योद्धाओं की मौत होती थी। इसी गणित का सहारा लेकर वो रोज सैनिकों के लिए भोजन बनाते थे और यही वजह थी कि अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं होता था।

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