NRC पर ममता की गृहयुद्ध की धमकी जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे जैसी क्यों लगती है ?

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नई दिल्ली। असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) का ड्राफ्ट जारी होने और 40 लाख से ज्यादा लोगों के इसमें नाम न होने के बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने गृहयुद्ध होने की धमकी दी है। ममता की इस धमकी से 72 साल पहले बंगाल में हुए उस नरसंहार की यादें ताजा हो जाती हैं, जिसे पाकिस्तान बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना के कहने पर किया गया था। ममता की ही तरह जिन्ना ने भी उस वक्त गांधीजी से कहा था कि अगर मुसलमानों को अलग मुल्क नहीं मिला, तो देश में सिविल वॉर होगा। इस धमकी को हकीकत में बदलकर जिन्ना ने उस वक्त हजारों लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया था।

क्या था जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन डे ?
भारत की आजादी की बात चल रही थी। तभी जिन्ना ने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क (पाकिस्तान) की मांग उठा दी। नेहरू और पटेल चाहते थे कि अलग देश जिन्ना को मिल जाए, लेकिन महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया। वो जिन्ना से कई बार मिले, लेकिन जिन्ना ने अलग मुल्क की रट लगाए रखी। गांधीजी के रुख को देखते हुए जिन्ना को लगा कि वो मुसलमानों के अलग मुल्क की राह में बड़ा रोड़ा बन सकते हैं। इसके बाद उसने 29 जुलाई, 1946  को मुंबई (तब बंबई) में मुस्लिम लीग की बैठक बुलाई। बैठक के बाद जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग दोहराई और 16 अगस्त, 1946  की तारीख डायरेक्ट एक्शन डे यानी सीधी कार्रवाई के दिन के तौर पर तय की।

हिंदुओं के नरसंहार की बनाई योजना
बंबई में हुई बैठक के बाद मुस्लिम लीग के नेताओं ने गुप्त बैठकें कीं और हिंदुओं के नरसंहार की योजना बनाई। इसके लिए कोलकाता (तब कलकत्ता) को चुना गया। इसकी वजह ये थी कि वहां जिन्ना के दाहिने हाथ हसन अली सुहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार थी। अविभाजित बंगाल भले ही मुस्लिम बहुल था। वहां 1946  में 54.3 फीसदी मुसलमान थे, लेकिन कोलकाता हिंदू बहुल था। सुहरावर्दी ने डायरेक्ट एक्शन डे से पहले साजिश के तहत शहर के 24 थानों में से 22 में मुसलमानों को थाना प्रभारी भी बना दिया। बाकी दो थानों का चार्ज एंग्लो इंडियन थानेदारों को दिया गया।

16 अगस्त 1946 को शुरू हुआ कत्लेआम
कोलकाता में 16 अगस्त, 1946 को ऑक्टरलोनी स्मारक के पास मुसलमानों ने विशाल सभा की। सभा में मुस्लिम लीग के लोग भाले, छुरे, गंडासे, लाठी और बंदूकों के साथ पहुंचे थे। ये सारे हथियार हावड़ा के तत्कालीन विधायक शरीफ खान ने उपलब्ध कराए थे। मुस्लिम लीग की सरकार में मंत्रियों ने अपनी गाड़ियों की टंकियां भी पेट्रोल से फुल करा ली थीं, ताकि हिंदुओं के घरों को जलाया जा सके। सभा में हिंदुओं के खिलाफ जहरीले भाषण दिए गए और फिर भीड़ ने शहर में घूम-घूमकर हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया। 72 घंटे में 10 हजार हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया। महिलाओं से सामूहिक बलात्कार किया गया और घरों को पेट्रोल डालकर जला दिया गया। हिंसा में 20 हजार से ज्यादा लोग घायल और 1 लाख से ज्यादा बेघर हुए। हालांकि, सरकारी आंकड़ों में मृतकों की संख्या 3 हजार 173 बताई गई। खून की होली नोआखाली (अब बांग्लादेश) में भी खेली गई। वहां भी हजारों हिंदुओं की जान ली गई।

नादिरशाह जैसा जिन्ना, मुगल बादशाह जैसे गांधी !
हिंदुओं का कत्लेआम होने पर महात्मा गांधी ने जिन्ना से इसे रोकने की गुजारिश की। ये गुजारिश ठीक वैसी ही थी, जैसे दिल्ली में कत्लेआम रुकवाने के लिए मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने साल 1739 में नादिरशाह से की थी। गांधीजी समझ गए थे कि जिन्ना अलग मुल्क की मांग मनवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। ऐसे में वो भी कत्लेआम के इस दबाव के आगे झुकने को मजबूर हो गए थे। गांधीजी की गुजारिश के बाद जिन्ना ने सुहरावर्दी को संदेश भेजकर हिंसा रोकने को कहा और कोलकाता और नोआखाली समेत बंगाल में तमाम जगह हिंसा रुक गई।

स्पेंस कमीशन की जांच भी रुकवा दी
कत्लेआम की जानकारी दिल्ली पहुंचने पर वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने स्पेंस जांच कमीशन बनाया। कमीशन ने पाया कि सीएम सुहरावर्दी और लीग की सरकार के तमाम मंत्री कत्लेआम से सीधे तौर पर जुड़े हैं। खुद को फंसते देखकर बंगाल की मुस्लिम लीग सरकार ने स्पेंस कमीशन की जांच रुकवा दी।

सुहरावर्दी को मिला कत्लेआम का तोहफा
डायरेक्ट एक्शन रुकने के बाद महात्मा गांधी कोलकाता और नोआखाली गए। वहां उन्होंने अनशन किया। अनशन के दौरान जिन्ना का करीबी और बंगाल का तत्कालीन सीएम हसन अली सुहरावर्दी भी गांधीजी के साथ घूमता रहा। हालांकि, पाकिस्तान बनने के बाद 16 अगस्त, 1946 के दिन हुए हिंदुओं के कत्लेआम के तोहफे के तौर पर जिन्ना ने सुहरावर्दी को 1956 में पूर्वी पाकिस्तान का पीएम बना दिया।

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