सभी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की तैयारी में मोदी सरकार !

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नई दिल्ली। इन दिनों आरक्षण की मांग को लेकर महाराष्‍ट्र झुलस रहा है। वहां मराठा आरक्षण की लड़ाई उग्र होती जा रही है। गुरुवार (26 जुलाई) को लगातार चौथे दिन पूरा राज्‍य आंदोलन की आग में झुलसता रहा। इस बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सभी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने पर विचार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि सरकार सभी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े और कमज़ोर तबकों को आरक्षण देने पर विचार कर रही है।  हालांकि ये चर्चा फिलहाल प्रारंभिक स्तर पर ही है।

आरपीआई सांसद ने उठाई मांग

राज्‍यसभा में शून्‍य काल के दौरान आरपीआई सांसद रामदास आठवले ने एससी, एसटी और ओबीसी आरक्षण को छुए बिना सभी जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की मांग की है। आठवले ने यह भी कहा है कि आर्थिक आधार पर मराठा, जाट, राजपूत, पाटीदार, गुज्‍जर, लिंगायत, ब्राह्मण सभी सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर 25 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसके लिए आरक्षण की सीमा 50 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत की जानी चाहिए।

समय-समय पर उठती रही है मांग 

देश के विभिन्‍न राज्यों में कई समुदाय आरक्षण को लेकर समय-समय पर मांग उठाते रहे हैं। कई जगह तो आंदोलन ने काफी हिंसक रूप भी लिया है। हरियाणा में तो जाट आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। सरकारें या राजनीतिक दल हमेशा इन मांगों को पूरा करने के नाम पर झूठे वादे करते रहे हैं। आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला एकदम साफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता। मौजूदा व्यवस्था में देश में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।

संविधान में साफ-साफ नहीं है जिक्र

आरक्षण को लेकर अक्‍सर बहस होती रही है। संविधान में सीधे तौर पर आरक्षण का तो जिक्र नहीं है, लेकिन संविधान की मूल भावना के हिसाब से ही आरक्षण की व्यवस्था की गई है। संविधान के अनुच्छेद 46 के मुताबिक, समाज में शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के हित का विशेष ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है। खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अन्याय और शोषण से बचाने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए।

अंग्रेजों के समय शुरू हुआ था आरक्षण

देश में आरक्षण की शुरुआत अंग्रेजों के शासन के समय में हुई थी। आजादी के बाद वर्ष 1950 में एससी के लिए 15%, एसटी के लिए 7.5% आरक्षण की व्यवस्था की गई। पहले केंद्र सरकार ने सिर्फ शिक्षा और नौकरी में आरक्षण लागू किया था। केंद्र के बाद राज्यों में भी आरक्षण की यही व्‍यवस्‍था लागू कर दी गई। राज्यों में जनसंख्या के हिसाब से एससी, एसटी को आरक्षण का लाभ मिलता है।

आरक्षण की होनी थी समीक्षा

आरक्षण लागू करते वक्त कहा गया था कि 10 साल बाद इसकी समीक्षा की जाएगी, हालांकि ऐसा हुई नहीं। फिर वर्ष 1979 में मंडल आयोग का गठन किया गया। यह आयोग सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़ों की पहचान के लिए बनाया गया था। वर्ष 1980 में मंडल आयोग ने पिछड़ों को 27% आरक्षण देने की सिफारिश की। इसके बाद साल 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर दी।

क्रीमी लेयर के साथ ओबीसी को मिलता है आऱक्षण

पीएम वीपी सिंह की सिफारिश के बाद वर्ष 1990 से ओबीसी को 27% आरक्षण मिलने लगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1992 में कहा कि ओबीसी को आरक्षण मिलना तो सही है, लेकिन उन्‍हें आरक्षण क्रीमी लेयर के साथ मिलना चाहिए। यानी पिछड़ा वर्ग में भी जो लोग आर्थिक रूप से संपन्न हैं, उनको आरक्षण न मिले। वर्ष 1993 में क्रीमी लेयर की सीमा एक लाख रुपये तय की गई, यानी जिनकी सालाना आमदनी एक लाख रुपये से ऊपर थी, वे क्रीमी लेयर में माने गए। सरकार ने अब सालाना आमदनी की सीमा बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दी है।

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