बिना ठीक से पकाए मत खाना पत्तागोभी, वरना दिमाग को खा जाएंगे कीड़े !

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नई दिल्‍ली। आपने अक्सर अपने घर में पैरेंट्स को बच्चों से कहते सुना होगा कि दिमाग में कीड़ा कुलबुला रहा है, लेकिन ये तो हुई कही-सुनी बात। लेकिन अगर असल में दिमाग में कीड़े कुलबुलाते हैं तो आपकी जान तक जा सकती है। आज हम आपको बताएंगे कि आखिर दिमाग में कीड़े कैसे घुस जाते हैं।

हाल ही में एक मामला ऐसा सामने आया जिसमें बच्ची के सिर में रोजाना दर्द बना रहता था। माता-पिता के लिए समझ पाना बहुत मुश्किल था कि आख़िर क्यों उनकी बेटी के सिर में दर्द हो रहा है। लगभग 6 महीने से ऐसा चल रहा था, लेकिन जब इसकी वजह पता चली तो उन्हें यक़ीन नहीं हुआ।

दरअसल , बच्ची के दिमाग़ में 100 से ज़्यादा टेपवर्म यानी फ़ीताकृमि के अंडे थे. जो दिमाग़ में छोटे-छोटे क्लॉट (थक्के) के रूप में नज़र आ रहे थे। जब इस बच्ची की जांच की गई तो पता चला कि बच्ची के दिमाग में सूजन थी। सूजन कम करने के लिए बच्ची को स्टेरॉएड्स दिया जाने लगा था। इसका असर ये हुआ कि आठ साल की बच्ची का वज़न 40 किलो से बढ़कर 60 किलो हो गया।

जैसे ही बच्‍ची का वजन बढ़ा तो तक़लीफ़ और बढ़ गई। इतना ही नहीं, चलने-फिरने में दिक्क़त आने लगी और सांस लेने में तक़लीफ़ शुरू हो गई। वो पूरी तरह स्टेरॉएड्स पर निर्भर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने बच्ची का सीटी-स्कैन किया, जिसके बाद उसे न्यूरोसिस्टिसेरसोसिस से पीड़ित पाया गया।

डॉक्टरों के मुताबिक, जिस समय बच्ची को अस्पताल लाया गया वो होश में नहीं थी। सीटी स्कैन में सफ़ेद धब्बे दिमाग़ में नज़र आए। ये धब्बे कुछ और नहीं बल्कि फ़ीताकृमि के अंडे थे और वो भी एक या दो नहीं बल्कि सौ से ज़्यादा की संख्या में।

सवाल उठता है कि दिमाग़ तक पहुंचे कैसे ये अंडे?

डॉक्टरों का कहना है कि कोई भी चीज़ जो आधी पकी रह जाए तो उसे खाने से, साफ़-सफ़ाई नहीं रखने से टेपवर्म पेट में पहुंच जाते हैं। इसके बाद ख़ून के जरिए शरीर के अलग-अलग हिस्सों में चले जाते हैं। डॉक्टरों ने बताया कि जब बच्ची उनके पास पहुंची तो उसके दिमाग पर प्रेशर बहुत अधिक बढ़ चुका था। अंडों का प्रेशर दिमाग़ पर इस कदर हो चुका था कि उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था।

टेपवर्म है क्या?

टेपवर्म एक तरह का पैरासाइट है। ये अपने पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाला जीव है, इसलिए ये शरीर के अंदर पाया जाता है, ताकि उसे खाना मिल सके। इसकी 5000 से ज़्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। ये एक मिमी से 15 मीटर तक लंबे हो सकते हैं।

कैसे फैलता है ये ?

टेपवर्म फ़्लैट, रिबन के जैसी संरचना वाले होते हैं। अगर फ़ीताकृमि का अंडा शरीर में आ जाता है तो यह आंत में अपना घर बना लेता है। हालांकि ज़रूरी नहीं कि ये पूरे जीवनकाल आंत में ही रहे, खून के साथ ये शरीर के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच जाता है।

एनएचएस के अनुसार, अगर शरीर में टेपवर्म है तो ज़रूरी नहीं कि इसके कुछ लक्षण नज़र ही आएं, लेकिन कई बार ये शरीर के कुछ अति-संवेदनशील अंगों में पहुंच जाता है, जिससे ख़तरा हो सकता है।

पत्ता-गोभी, पालक को अगर अच्छी तरह पकाकर नहीं बनाया जाए तो भी टेपवर्म शरीर में पहुंच सकता है, जो शरीर के लिए हानिकारक है।

जो सब्जियां गंदे पानी में या मिट्टी में उगती हैं, उन सब्जियों को धोकर खाने की सलाह दी जाती है।

बचाव के उपाय

टेपवर्म एक बार शरीर में पहुंच जाए तो इससे छुटकारा पाना बहुत मुश्किल है। इसके लिए सबसे अच्छा यही है कि सावधानी बरती जाए।

अगर आप मांस खाने के शौकीन हैं तो उसे अच्छी तरह पकाए बिना ना खाएं।

फल-सब्जियों को खाने से पहले अच्छी तरह धो लें, तभी खाएं।

खाना बनाने या पीने के लिए हमेशा साफ़ पानी का ही इस्‍तेमाल करें।

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