जयंती पर विशेष : और इस तरह चंद्रशेखर के नाम के साथ जुड़ा ‘आजाद’

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झाबुआ। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक आदिवासी बहुल गांव है। गांव का नाम है भावरा। दीपावली का त्योहार था। तमाम बच्चे दीये जला रहे थे। कुछ आतिशबाजी छुड़ा रहे थे। इन्हीं में से एक बच्चे के पास थी मेहताब वाली माचिस, जिसकी तीलियां जलाने पर रंगीन रोशनी होती थी। चंद्रशेखर आजाद भी इन बच्चों के साथ थे। उनके पास न पटाखे थे और न ही मेहताब वाली माचिस। जिस लड़के के पास माचिस थी, वो तीलियां जलाता और रंगीन रोशनी निकलती तो जमीन पर तीली फेंक देता। चंद्रशेखर लगातार उसे देख रहे थे। उन्होंने उस लड़के को एक नई चुनौती दे दी और इस चुनौती से साबित कर दिया कि वो कितने हिम्मतवाले हैं।

हथेली पर रखकर जला दीं तीलियां

चंद्रशेखर की उम्र बहुत कम थी, लेकिन उन्होंने माचिस लिये बच्चे से कहा, ‘तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियां एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूँ।’
जिस बालक के पास महताब की माचिस थी, उसने वो चंद्रशेखर के हाथ में दे दी और बोला, ‘जो कुछ कहा है, उसे करके दिखाओ तब जानूं।’
चंद्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियां निकालकर अपने हाथ में ले लीं। तीलियां उल्टी–सीधी थीं। कुछ तीलियों का मसाला चन्द्रशेखर की हथेली की ओर भी था। चंद्रशेखर ने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। सारी तीलियां जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर हथेली को जलाने लगीं। जलन काफी थी, लेकिन चंद्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं फेंका, जब तक की उनकी रंगीन रोशनी खत्म नहीं हो गई। तीलियां फेंकने के बाद चंद्रशेखर ने बच्चों से कहा – ‘देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियां नहीं छोड़ीं।’

पिता को देख जंगल में भागे

चंद्रशेखर के साथियों ने देखा कि उनकी हथेली में फफोले निकल आए थे। कुछ लड़के दौड़ते हुए उनकी मां के पास घटना की खबर देने पहुंचे। चंद्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे। उन्हें पता चला, तो वो घटनास्थल की ओर भागे। चंद्रशेखर ने पिता को आते देखा तो जंगल में भाग गए। सोचा कि पिताजी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक चंद्रशेखर जंगल में ही रहे। एक दिन तलाश करती हुई उनकी मांग जंगल में पहुंचीं। तब चंद्रशेखर को घर लाईं।

इस तरह नाम पड़ा ‘आज़ाद’

1921 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तो चंद्रशेखर उससे जुड़ गए। एक दिन धरना देते हुए गिरफ्तार किए गए। पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट काफी कड़ी सजा देते थे। मजिस्ट्रेट ने सवाल दागा –

‘तुम्हारा नाम क्या है ?’
‘मेरा नाम आज़ाद है।’
‘तुम्हारे पिता का क्या नाम है ?’
‘मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।’
‘तुम्हारा घर कहां है ?’
‘मेरा घर जेलखाना है।’

मजिस्ट्रेट 14 साल के चंद्रशेखर के इन जवाब से चिढ़ गए। उन्होंने 15 बेंत मारने की सजा सुना दी। जल्लाद ने बालक चन्द्रशेखर की चमड़ी उधेड़ दी, लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की। हर बेंत पर वो ‘महात्मा गांधी की जय’ और ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते रहे। 15 बेंत लगाने के बाद जेल के नियम के मुताबिक जेलर ने चंद्रशेखर की हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। चंद्रशेखर ने फिर ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाया और पैसे जेल के मुंह पर दे मारे। इसके बाद चंद्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया।

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