देशद्रोह संबंधी कानून में इस वजह से बदलाव करना चाहती है मोदी सरकार

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नई दिल्ली। खबर है कि मोदी सरकार अब देशद्रोह संबंधी कानून यानी आईपीसी की धारा 124-ए में बदलाव करने जा रही है। इसकी बड़ी वजह ये है कि इस कानून के तहत बहुत ही कम लोगों को सजा होती है। जबकि, दोषी पाए जाने पर देशद्रोह कानून के तहत उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।

यूं फेल हो जाता है देशद्रोह संबंधी कानून
मोदी सरकार के आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 से 2016 तक 179 लोगों पर देशद्रोह कानून के तहत कार्रवाई हुई। इनमें से सिर्फ 2 ही दोषी पाए गए। 2014 में 58 लोगों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमें से सिर्फ 1 दोषी ठहराया जा सका। 2015 में 124-ए के तहत 30 केस दर्ज हुए और 73 लोग पकड़े गए, लेकिन किसी पर भी आरोप साबित नहीं हुआ। 2016 में 35 केस में 48 लोगों पर देशद्रोह का आरोप लगा, लेकिन 1 ही दोषी साबित हुआ। यानी देशद्रोह के आरोप साबित नहीं हो पाते।
 
सबसे पहले आरोपी बाल गंगाधर तिलक थे
देशद्रोह संबंधी कानून का सबसे पहले इस्तेमाल मशहूर स्वाधीनता सेनानी बाल गंगाधर तिलक पर अंग्रेजों ने किया था। बता दें कि साल 1859 तक देशद्रोह संबंधी कानून नहीं था। इसे अंग्रेजों ने 1860 में बनाया। साल 1870 में धारा 124-ए को आईपीसी में शामिल कर दिया गया।

भाषण में सरकार की मुखालिफत देशद्रोह नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में देशद्रोह की परिभाषा साफ करते हुए कहा था कि सरकार के खिलाफ भाषण देना देशद्रोह नहीं है। कोर्ट ने ये फैसला केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मुकदमे में दिया था। दरअसल, केदारनाथ ने सरकार के खिलाफ भाषण दिया था और बिहार की तत्कालीन सरकार ने उन पर देशद्रोह का केस कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना या फिर प्रशासन पर टिप्पणी से देशद्रोह नहीं होता। कानून व व्यवस्था में गड़बड़ी पैदा करने या फिर हिंसा को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति या फिर मंशा हो, तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है।

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