पुरी रथयात्रा : जानिए, कैसे तैयार होता है भगवान जगन्नाथ का रथ

501 0
  • 88 दिन में 195 कारीगरों ने बनाया भगवान जगन्नाथ का रथ, 865 पेड़ों की लकड़ियों का हुआ इस्तेमाल

पुरी। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की महिमा देश में ही नहीं, पूरे विश्व में है। पुराणों में जगन्नाथ पुरी को धरती का बैकुंठ कहा गया है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार, पुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। हर साल पुरी से श्री जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रथमा को निकाली जाती है। ये हिंदुओं का बहुत बड़ा पर्व है। इस साल यह रथयात्रा 14 जुलाई को शुरू हो रही है। रथयात्रा के दौरान रथ को अपने हाथों से खींचना अत्‍यंत शुभ माना जाता है।

क्‍या है रथयात्रा का इतिहास ?

पौराणिक मान्यता है कि द्वारका में एक बार श्री सुभद्रा जी ने नगर देखना चाहा, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें रथ पर बैठाकर नगर का भ्रमण कराया। इसी घटना की याद में हर साल तीनों देवों को तीन अलग-अलग रथ पर बैठाकर नगर के दर्शन कराए जाते हैं। रथयात्रा से जुड़ी कई अन्य रोचक कथाएं भी हैं जिनमें से एक जगन्नाथ जी, बलराम जी और सुभद्रा जी की अपूर्ण मूर्तियों से भी संबंधित हैं।

रथ तैयार करने में जुटे विश्वकर्मा सेवक

अक्षय तृतीया से बनने शुरू होते हैं रथ 

अक्षय तृतीया से रथयात्रा के एक दिन पहले तक तीनों रथों को बनाकर तैयार किया जाता है। बसंत पंचमी के दिन से ओडिशा के दसपल्ला जिले के नवागढ़ फॉरेस्ट डिवीजन के जंगलों से रथ निर्माण के लिए 865  किस्‍म के पेड़ों की लकड़ियां ली जाती है। इन लकडि़यों की पहचान मंदिर समिति करती है। सबसे पहले देवी बाड़ा रौला ठकुराइन मंदिर में इन लकड़ियों की पूजा की जाती है। इसके बाद रथ निर्माण के लिए तय लकड़ियों को अक्षय तृतीया के पहले जगन्नाथ मंदिर के सामने परिसर में पहुंचाया जाता है, जहां इसे तैयार किया जाता है। आयोजन समिति बाद में रथ की इन लकड़ियों को न्यूनतम दर पर नीलाम कर देती है।

इस बार 88 दिन में तैयार हुआ रथ

इस बार जगन्नाथ के साथ उनके भाई-बहन बलभद्र और सुभद्रा के रथ का निर्माण 88  दिन में 195  कारीगरों ने मिलकर किया है। इस साल अधिक मास पड़ने से जेठ दो महीने का था, जिसके कारण रथ बनाने के लिए करीब 3 महीने मिल गए। वैसे रथ निर्माण के लिए 58 दिन ही मिलते हैं। रथ बनाने में लगे कारीगरों को विश्वकर्मा सेवक कहा जाता है। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है।

हर साल बनाते हैं नया रथ 

श्री जगन्नाथ मंदिर समिति के जनसंपर्क अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापंडा बताते हैं कि पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं। हर साल नए रथ तैयार किए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है। इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है। रथ निर्माण व यात्रा में 5 करोड़ रु. से ज्यादा की राशि खर्च होती है। दुनियाभर से लाखों भक्त रथयात्रा में शामिल होते हैं। लक्ष्‍मीधर बताते हैं कि हर साल तीनों रथ नया बनाया जाता है।

कितने दिन चलता है रथयात्रा महोत्‍सव  ?

रथयात्रा महोत्सव में पहले दिन भगवान जगन्नाथ, बलराम और बहन सुभद्रा का रथ आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की शाम तक जगन्नाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थिति गुंडीचा मंदिर तक खींच कर लाया जाता है। दूसरे दिन रथ पर रखी जगन्नाथ जी, बलराम जी और सुभद्रा जी की मूर्तियों को विधि पूर्वक उतार कर इस मंदिर में लाया जाता है और अगले 7 दिनों तक श्रीजगन्नाथ जी यहीं निवास करते हैं। इसके बाद आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन वापसी की यात्रा की जाती है जिसे ‘बाहुड़ा यात्रा’ कहते हैं। इस दौरान पुन: गुंडिचा मंदिर से भगवान के रथ को खींच कर जगन्नाथ मंदिर तक लाया जाता है। मंदिर तक लाने के बाद प्रतिमाओं को पुन: गर्भ गृह में स्थापित कर दिया जाता है।

जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी कुछ आश्‍चर्यजनक बातें

  • जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है।
  • मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र है। इस चक्र को किसी भी दिशा से खड़े होकर देखने पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी तरफ है।
  • मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है, फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।
  • मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखते ही आपको समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई पड़ना बंद हो जाती है, लेकिन जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देने लगती है।
  • भगवान जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। यहां तक कि हवाई जहाज भी मंदिर के ऊपर से नहीं निकलता।
  • मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता। यही नहीं,  मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।
  • दिन के किसी भी समय जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।
  • आमतौर पर दिन में चलने वाली हवा समुद्र से धरती की तरफ और शाम को धरती से समुद्र की तरफ चलती है,  लेकिन आपको जानकर आश्‍चर्य होगा कि पुरी में यह प्रक्रिया उल्टी है।

Related Post

रिसर्च : 6 राज्‍यों में मुस्लिम परिवारों में बच्‍चों का औसत हिंदुओं से ज्‍यादा

Posted by - August 2, 2018 0
लखनऊ। एक आम धारणा है कि मुस्लिम परिवारों में औसतन 8-10 बच्‍चे होते हैं। 2011 की जनसंख्‍या के आंकड़ों के…

झुग्गियों और चॉल में रह रहे हैं मेहुल चौकसी की कंपनियों के डायरेक्टर्स!

Posted by - February 20, 2018 0
कंपनी द्वारा बताए अधिकतर डायरेक्टर या तो फर्जी या उनके बताए पते पर कोई और रह रहा मुंबई। पीएनबी घोटाले…

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *