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वे 2 साल, जब भारत में सबकुछ राइट टाइम था !

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नई दिल्ली। आजकल ज्यादातर लोगों को सरकारी काम से शिकायत होती है। शिकायत इसकी कि ट्रेनें लेट हो रही हैं। शिकायत इसकी कि सरकारी दफ्तर जाओ तो इधर से उधर दौड़ाया जाता है। घूसखोरी की शिकायत तो आम है, लेकिन क्या आपको पता है कि इस देश में ऐसे भी 2 साल रहे हैं, जब हर सरकारी चीज राइट टाइम थी। सबकुछ। जी हां, जिस सरकारी तंत्र को लेटलतीफी की वजह से लोग ताने देते हैं, वो उन 2 साल में राइट टाइम था।

राइट टाइम पर चल रहा था भारत
भारत के राइट टाइम होने की ये कहानी है 25 जून, 1975 की। 25 जून, 1975 को ही तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति रहे फखरुद्दीन अली अहमद से इमरजेंसी के अध्यादेश पर दस्तखत कराए थे। देर रात इमरजेंसी का अध्यादेश जारी किया गया था और देश में लोग उस वक्त सो रहे थे। लोगों को सुबह अखबारों और रेडियो में 8 बजे इंदिरा गांधी के राष्ट्र के नाम संबोधन से इमरजेंसी लगने का पता चला था।

उन 2 साल में बदल गया था देश
इमरजेंसी के दौरान आम लोगों को जबरन जेलों में ठूंसा गया। जबरन लोगों की नसबंदी की जाने लगी, यानी अत्याचारों का सिलसिला तो चला, लेकिन इस दौरान भारत बिल्कुल बदल गया था। पैसेंजर ट्रेनें तक वक्त पर चलने लगी थीं। सरकारी कर्मचारी यूं तो आपको लेट ही दफ्तर पहुंचते दिखे होंगे, लेकिन इमरजेंसी का खौफ इतना था कि हर सरकारी दफ्तर में 10 बजे से पहले ही कर्मचारी अपनी कुर्सियों पर बैठे दिखते थे। घूसखोरी भी काफी हद तक खत्म हो गई थी। हाथों-हाथ सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने लगा था।

कब तक रही इमरजेंसी
25 जून, 1975 को लगाई गई इमरजेंसी को इंदिरा गांधी ने 21 मार्च, 1977 को हटा लिया और इसके साथ ही देश फिर पुराने ढर्रे पर लौट गया, जहां भ्रष्टाचार था, लेटलतीफी थी और सरकारी तंत्र में कामकाज न होने का पुराना रंग-ढंग था। हां, इमरजेंसी ने आम लोगों को जेलों में पहुंचाया। कई बार नाबालिगों तक की नसबंदी की खबरें आईं, लेकिन वे 2 साल जैसे देश में एक तरह से अच्छे दिन थे।

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